12 मार्च, 2017

क्या गुण-मिलान के समय ‘कूट-दोष का परिहार’ सम्भव है?





अक्सर विवाह के समय कुण्डलियों में गुण-मिलान करते समय लोग परिहारों का ध्यान नहीं रखते और इस वजह से कई विवाह होते-२ रह जाते हैं। आइये इस लेख में हम कूट-दोषों के परिहारों के कुछ सूत्रों के बारे में जानते हैं।

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मेरे पिछले एक लेख में आपने ‘३६ गुणों के मिलान’ के बारे में जाना, जिसमें आपने जाना कि कूट-मिलान के अन्तर्गत वर और कन्या के किन-२ गुणों का मिलान किया जाता है। उस लेख में एक जगह ‘परिहारों’ का जिक्र आया था और मैंने आपको बताया था कि इण्टरनेट पर कुण्डली-मिलान के लिए मुफ़्त सेवा प्रदान करने वाले परिहारों का ध्यान नहीं रखते। आज हम इन्हीं परिहारों के बारे में आप से बात करेंगे।

अष्टकूट मिलान के समय प्रत्येक कूट का मिलान होने पर पूर्व-निर्धारित अंक प्रदान किये जाते हैं। अगर किसी भी प्रकार का कूट-दोष हो, तो उसमें सम्बन्धित अंक नहीं मिलते। इसके लिए परिहारों की व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत कुछ सूत्र दिये गये हैं। अगर आप उन सूत्रों में दी गई किन्हीं शर्तों को पूरा करते हैं, तो आपका सम्बन्धित कूट-दोष समाप्त हो जाता है और आपको उस कूट से सम्बन्धित पूरे या कुछ अंक प्राप्त हो जाते हैं। किन कूट-दोषों का निवारण किन सूत्रों से होता है तथा फ़लस्वरूप आपको कितने अंक प्राप्त होते हैं, इनका वर्णन निम्न तालिका में दिया गया है। सूत्रों की विस्तार से व्याख्या हम आगे इसी लेख में करेंगे। जरा इस तालिका पर गौर फ़रमाइये : -






 

 

 परिहार सम्बन्धी सूत्रों की विस्तारित व्याख्या

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 (१)     राशीश मैत्री : -



यदि वर और कन्या की राशियों के स्वामी आपस में मित्र हों, तो निम्न दोष नष्ट हो जाते हैं या उनका परिहार हो जाता है। ये दोष इस प्रकार हैं : -
वर्ण-दोष, वर्ग-दोष, तारा दोष, योनि-दोष, गण-दोष, भकूट-दोष (द्विर्द्वादश, षडाष्टक, नव-पंचक) तथा नाड़ी-दोष।

 

(२)     राशीश एकता : -



यदि वर और कन्या की राशि का स्वामी एक ही ग्रह हो; तो भी उन सभी दोषों का परिहार सम्भव है, जिनका जिक्र राशीश-मैत्री के समय किया गया था। ये राशियाँ एवं उनके स्वामी-ग्रह इस प्रकार हैं : -
मेष और वृश्चिक (मंगल), वृष और तुला (शुक्र), मिथुन और कन्या (बुध), धनु और मीन (गुरु) तथा मकर और कुम्भ (शनि)।

 

(३)     नवमांशेष मैत्री तथा नवमांशेष एकता : -



यदि वर और कन्या के नवांश के स्वामी आपस में मित्र हों या एक ही हों, तो उनके ग्रह-मैत्री सम्बन्धी दोष को दूर किया जा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि वर और कन्या के राशि-स्वामी या नवांश-स्वामी का आपस में मित्र होना या एक ही होना आवश्यक है।

 

(४)     सद्‌भकूट : -



यदि कुण्डली भकूट-दोष से रहित हो, तो सद्‌भकूट कहलाता है। सद्‌भकूट में वर और कन्या की राशियाँ परस्पर ३/११, ४/१०, १/७ अथवा एक ही होती हैं। सद्‌भकूट भी वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह-मैत्री तथा गण-दोष को समाप्त करता है।


यदि वर और कन्या की एक ही राशि हो, तो उपर्युक्त दोषों के साथ-२ नाड़ी दोष भी नष्ट हो जाता है। नाड़ी दोष के ३ परिहार इस प्रकार हैं : -

   (अ)  वर और कन्या की राशि एक परन्तु नक्षत्र अलग-२ हों,
 
   (ब)  वर और कन्या का नक्षत्र एक परन्तु राशियाँ भिन्न-२ हों,
  
   (स)  वर और कन्या का नक्षत्र एक ही हो, परन्तु चरण अलग-२ हों।



उपर्युक्त परिहारों को देखने के बाद आप समझ ही गये होंगे कि ना जाने कितनी शादियाँ इनकी जानकारी के अभाव में होते-२ रह जाती हैं। आशा करते हैं, आप इस जानकारी से अवश्य लाभान्वित होंगे। अगर आपकी कोई भी शंका हो, तो आप किसी भी माध्यम से हमसे सम्पर्क कर सकते हैं।


फ़िर मिलते हैं, विदा!


                                                                            आपकी शुभेच्छु
                                                                                   गायत्री

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