11 फ़रवरी, 2017

‘वृष’ लग्न की कुण्डली के विभिन्न भावों में ‘शनि’ का फ़ल





अगर आप का जन्म वृष लग्न में हुआ है और आप अपनी कुण्डली में स्थित ‘शनि’ ग्रह का प्रभाव आपके जीवन पर क्या होगा, ये जानने की इच्छा रखते हैं; तो ये लेख आपकी मदद कर सकता है।

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हम विभिन्न लग्न की कुण्डलियों में स्थित विभिन्न ग्रहों के भविष्यफ़ल पर आधारित लेखों की शृंखला पर काम कर रहे हैं। इसी शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है, वृष लग्न की कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘शनि’ ग्रह का फ़ल।

वैसे भी शनि का ग्रहों के बीच एक महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन वृष लग्न के लिए तो ये ‘योगकारक’ होता है। वृष लग्न की कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित शनि क्या फ़ल देगा, इसे निम्न प्रकार जाना जा सकता है : -

 

प्रथम भाव में : -


पहले भाव में बैठकर शनि ज़िद्दी बना देता है, लेकिन कड़ी मेहनत भी करवाता है। ऐसा व्यक्ति बड़े प्रभावशाली ढंग से जीवन व्यतीत करता है तथा पिता एवं राज-व्यवस्था से इज्जत प्राप्त करता है। कभी-२ भाई-बहनों के स्थान में थोड़ी अरुचि तथा स्त्री-स्थान में थोड़ी वैमनस्यता भी दिखाई देती है।



वृष लग्न वाले जातकों के लिए शनि ‘योगकारक’ होता है!



द्वितीय भाव में : -


द्वितीय स्थान में शनि होने पर व्यक्ति राजकीय सम्बन्धों तथा पिता से अकूत धन-सम्पत्ति तो प्राप्त करता है, परन्तु अन्दर ही अन्दर कुछ बन्धन सा भी महसूस करता है। ऐसे लोग माता से कुछ असंतोष तथा मकान-भूमि आदि की थोड़ी कमी भी महसूस करते हैं।

 

 

तृतीय भाव में : -


जिस व्यक्ति के तीसरे स्थान में कर्क राशि का शनि हो, ऐसे व्यक्ति अपने परिश्रम से ऊँचाइयों पर पहुँचते हैं। ये लोग बहुत ही हाज़िर-जवाब होते हैं। ऐसे लोग खर्च करने के मामले में लापरवाही बरतते हैं, परन्तु धर्म-कर्म का पालन नियम-पूर्वक करते हैं।

 

 

चतुर्थ भाव में : -


चतुर्थ स्थान में सिंह राशि का शनि व्यक्ति को माता-पिता के सम्बन्ध में असंतोष प्रदान करता है। ऐसे लोग शत्रु स्थान में काफ़ी शक्ति व ऊँचा प्रभाव रखते हैं। भले ही ये लोग सुख प्राप्ति के मामले में कमी महसूस करते हों, परन्तु मुश्किलों से गुजर कर भी अपनी भाग्य-वृद्धि करने में सक्षम होते हैं।



द्वितीय स्थान में शनि वाले जातक धन-सम्पत्ति के बावजूद बन्धन महसूस करते हैं!



पंचम भाव में : -


पंचम स्थान में शनि कन्या राशि में स्थित होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी बुद्धि के बल पर राज-समाज में मान-सम्मान प्राप्त करता है। ये लोग तत्व-ज्ञानी होने के साथ-२ बड़े ही धैर्य व गंभीरता के साथ अपनी बातें दूसरों के सामने रखते हैं। धन की वृद्धि करने की लालसा इनसे बहुत ज्यादा मेहनत भी करवा लेती है।

 

षष्ठ भाव में : -


षष्ठ भाव में शनि अपनी उच्च राशि में होता है। जिसकी वजह से ऐसे लोग पिता के स्थान, मान-प्रतिष्ठा एवं शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखते हैं तथा उसकी उन्नति एवं विस्तार के लिए दिन-रात प्रयत्नशील रहते हैं। ऐसे लोग जीवन के लिए अति आवश्यक चीजों का अभाव महसूस करते हैं।

 

सप्तम भाव में : -


सप्तम भाव में वृश्चिक राशि के शनि वाले जातक गृहस्थ-जीवन का सुख उठाते हुये भी कुछ अशान्ति एवं अलकसाहट महसूस करते हैं। ये लोग धर्म का सामान्य रूप से पालन करते हैं। इन्हें पिता स्थान से शक्ति प्राप्त होती है, परन्तु उसमें इनकी कोई विशेष रुचि नहीं होती।



तृतीय स्थान का शनि जातक को परिश्रम करवा कर ही ऊँचाइयों पर पहुँचाता है!



अष्टम भाव में : -


अष्टम भाव में शनि वाले जातक जहाँ एक ओर लम्बी आयु पाते हैं, वहीं दूसरी ओर भाग्य की उन्नति में रुकावटें एवं यश में कमी भी पाते हैं। ये लोग राज-समाज के सम्बन्ध में भी मान-सम्मान में कमी महसूस करते हैं। ऐसे लोग कुछ गुप्त शक्तियाँ रखते हुये कभी-२ धर्म की हानि भी कर बैठते हैं।

 

नवम्‌ भाव में : -


जिन व्यक्तियों का शनि नवम्‌ स्थान में मकर राशि में होता है, वे अपने पिता के सहयोग से उन्नति के पथ पर अपने-आप ही बढ़ते चले जाते हैं। राजकीय सम्मान पाने के मामले में भी ये भाग्यशाली होते हैं तथा अपने सुन्दर कार्यों से इसे निरन्तर बढ़ाते ही चले जाते हैं। परन्तु अपने भाई-बहनों से इनके सम्बन्ध कुछ शुष्कता लिए हुये होते हैं।

 

दशम्‌ भाव में : -


दशम्‌ भाव में शनि अपनी ही राशि ‘कुम्भ’ में स्थित होता है। ऐसे व्यक्ति राज-समाज में तो काफ़ी मान-सम्मान पाते हैं, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में इन्हें काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोग जहाँ एक तरफ़ खर्च के सम्बन्ध में काफ़ी लापरवाही दिखाते हुये अनेक दिक्कतों का सामना करते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ अपनी माँ से भी इनके सम्बन्ध ज्यादा अच्छे नहीं होते।



अष्टम स्थान में शनि कुछ गुप्त शक्तियाँ भी देता है!



एकादश भाव में : -


एकादश स्थान में मीन राशि वाले जातक लोगों के बीच काफ़ी इज्जत एवं मान पाने वाले होते हैं। ये मेहनत के साथ-२ लाभ पाने के लिए गहरी व टेढ़ी चालों का भी प्रयोग करते हैं, क्योंकि इनकी इच्छायें व लालसायें काफ़ी ऊँची होती हैं। इन्हें बुद्धिमान्‌ होने के साथ-२ सन्तान का सुख भी प्राप्त होता है।

 

द्वादश भाव में : -


द्वादश स्थान में शनि अपनी नीच राशि में होता है। ऐसे व्यक्ति पिता के सम्बन्ध में काफ़ी हानि का योग पाते हैं। ये लोग बाहरी स्थानों से लाभ प्राप्त करने तथा भाग्य की उन्नति के लिए गलत रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। इन लोगों का शत्रु स्थान में प्रभाव बढ़ाने के लिए भी प्रयास चलता रहता है।



मुझे पता है, अन्य शेष लग्न वाले लोगों के लिए इन्तजार करना कितना मुश्किल साबित हो रहा होगा; आखिर आपके भविष्य का सवाल है भई! परन्तु ये हमेशा याद रखिए, इन्तज़ार का फ़ल हमेशा मीठा ही होता है। .. 🙂



फ़िर मिलते हैं, विदा!


                                                                              आपकी शुभाकांक्षी
                                                                                       गायत्री


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