02 फ़रवरी, 2017

‘मेष’ लग्न की कुण्डली के विभिन्न भावों में ‘गुरु’ के स्थित होने का फ़ल





अगर आपकी कुण्डली ‘मेष’ लग्न की है, तो उसके किसी भी भाव में स्थित ‘गुरु’ क्या फ़ल देगा; इसका वर्णन इस लेख में किया गया है। तो उठाइये अपनी कुण्डली और शुरु हो जाइये।

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आपके पास कुण्डली तो है, पर उसे दिखाने को अच्छा ज्योतिषी नहीं है या आपके पास ज्योतिषी के पास [मेरे पास :))] जाने के लिए पर्याप्त समय नहीं है, तो परेशान मत होइये; मेरा ये लेख आपकी काफ़ी मदद कर सकता है।

हर व्यक्ति की कुण्डली में एक विशेष लग्न होने के साथ-२ अलग-२ भावों में विभिन्न ग्रह भी स्थित होते हैं, जिनका अलग-२ फ़लादेश होता है। हम अलग-२ लग्नों की कुण्डली में अलग-२ ग्रहों के विभिन्न भावों में स्थित होने के फ़लादेश पर लेखों की एक शृंखला निकालने जा रहे हैं। बस आप धैर्य के साथ अलग-२ कड़ियों यानि लेखों की प्रतीक्षा कीजिए। आज हम शुरुआत ‘मेष’ लग्न एवं ‘गुरु’ ग्रह से कर रहे हैं।


‘मेष’ लग्न की कुण्डली में ‘गुरु’ के विभिन्न भावों में स्थित होने का फ़ल निम्न प्रकार जाना जा सकता है : -

 

प्रथम भाव में : -


पहले स्थान में गुरु मेष राशि में ही स्थित होता है। ऐसा जातक सुन्दर, भाग्यशाली तथा मान एवं यश युक्त होता है। इन्हें सन्तान एवं विद्या का सुख भी प्राप्त होता है। ये लोग शानदार खर्च करने वाले तथा अन्य बाहरी स्थानों से भाग्य में उन्नति पाने वाले होते हैं।



मेष लग्न में पंचम भाव का गुरु काफ़ी तीव्र बुद्धि प्रदान करता है!



द्वितीय भाव में : -


द्वितीय स्थान में वृष राशि में गुरु वाले जातक धन को अत्यधिक महत्व देते हैं तथा भाग्य की ताकत और बाहरी स्थानों के सम्पर्क से धन कमाते हैं। अपनी फ़िजूलखर्ची की वजह से ये लोग धन का संग्रह ना के बराबर कर पाते हैं। ऐसे लोग अपने पिता की बिल्कुल परवाह नहीं करते, किन्तु अपने शत्रुओं के प्रति दयाभाव रखते हैं।

 

तृतीय भाव में : -


जिन व्यक्तियों का गुरु तीसरे स्थान में मिथुन राशि में होता है, वे काफ़ी भाग्यशाली समझे जाते हैं। वे अपने पुरुषार्थ के बल पर अपने भाग्य को काफ़ी ऊँचाइयों पर ले जाते हैं। इन्हें अपने भाई-बहनों का अधूरा सुख प्राप्त होता है। ये लोग यथाशक्ति अपने धर्म का पालन करते हैं।

 

चतुर्थ भाव में : -


चतुर्थ स्थान में गुरु कर्क राशि में होता है। ये उसकी उच्च राशि है। ऐसे लोगों की भाग्य की शक्ति से काफ़ी जमीन-जायदाद होती है; परन्तु आन्तरिक रूप से ये लोग मानसिक सुख-शान्ति और माता के प्यार में कमी महसूस करते हैं। ये लोग अपने सुख के साधनों में वृद्धि करने के लिए खूब खर्च करते हैं, परन्तु अपनी उन्नति के लिए मेहनत करने से यथाशक्ति खुद को बचाते हैं।



मेष लग्न में अष्टम स्थान में गुरु हो, तो जातक अपने दुर्भाग्य को कोसते रहते हैं!




पंचम भाव में : -


पंचम स्थान में सिंह राशि के गुरु वाले जातक अत्यन्त भाग्यवान तथा बुद्धिमान होते हैं। ये लोग लौकिक व अलौकिक विषयों पर बहुत ही गूढ़ बातें कहने व समझने वाले होते हैं। ये लोग धर्म-शास्त्रों पर अधिकार रखते हैं तथा अपनी वाणी की शक्ति द्वारा यश व मान प्राप्त करते हैं।


षष्ठ भाव में : -


जिन व्यक्तियों का गुरु षष्ठ स्थान में कन्या राशि का होता है, वे भाग्य, धर्म और यश के सम्बन्ध में कुछ कमजोरी रखते हैं। ऐसे लोग खर्च के सम्बन्ध में बन्धन व परतन्त्रता का अनुभव करते हैं। इन लोगों का भाग्योदय बड़ी-२ परेशानियों को झेलने के बाद अन्य स्थानों के सम्पर्क से अत्यन्त मुश्किलों के बाद ही सम्भव हो पाता है। ये शत्रुता के मामले में ताकत के बजाय कूट-शक्ति से काम लेते हैं।


सप्तम भाव में : -


सप्तम स्थान में गुरु तुला राशि में होता है। ऐसे लोगों के जीवनसाथी धार्मिक प्रवृत्ति के तथा कुछ बड़प्पन लिए हुये होते हैं। ये लोग ईश्वर एवं भाग्य पर विश्वास रखने वाले तथा स्वयं की उन्नति के लिए दिन-रात परिश्रम करने वाले होते हैं।



मेष लग्न और चतुर्थ भाव में गुरु हो, तो जातक मेहनत से बचते हैं!



अष्टम भाव में : -


अष्टम स्थान में वृश्चिक राशि के गुरु वाले जातक भाग्य स्थान में कमजोरी तथा यश में कमी पाने वाले होते हैं। ऐसे लोगों की आयु लम्बी होती है तथा इन्हें पुरातत्व का लाभ भी मिलता है। ये लोग अक्सर अपने दुर्भाग्य का रोना रोते देखे जा सकते हैं।


नवम् भाव में : -


जिन व्यक्तियों का गुरु नवम् स्थान में धनु राशि का होता है, ऐसे लोग अत्यन्त भाग्यशाली होते हुये भी भाग्य में कुछ कमजोरी पाने वाले होते हैं। इनको अपने भाई-बहनों का सहयोग प्राप्त होता है तथा ये अपने पुरुषार्थ से सफ़लता प्राप्त करते हैं। ये लोग सन्मार्ग पर चलने वाले तथा भाग्य पर विश्वास करने वाले होते हैं।


दशम् भाव में : -


दशम् स्थान में ‘गुरु’ मकर राशि में होता है, जो कि उसकी नीच राशि है। ऐसे लोगों को राज-स्थान तथा राजकीय मामलों से कोई विशेष फ़ायदा नहीं होता। ये लोग मातृ-प्रेम तथा सुख-शांति को प्राप्त करने के लिए सच्चे मन से प्रयास करते हैं। ऐसे लोग बड़ी पेचीदा युक्तियों के प्रयोग से थोड़े से परिश्रम द्वारा ही काफ़ी लाभ कमाते हैं।



मेष लग्न में द्वितीय भाव में स्थित गुरु वाले जातक पिता की तरफ़ से मुख मोड़ लेते हैं!



एकादश भाव में : -


एकादश स्थान में कुम्भ राशि के गुरु वाले जातक भाग्यवान होने के साथ-२ अन्य स्थानों के सम्पर्क से काफ़ी लाभ कमाते हैं। ये अपने धन का काफ़ी हिस्सा भोग-विलास में खर्च कर देते हैं। ऐसे लोग धन-अर्जन, विद्यार्जन एवं बोलचाल के मामले में काफ़ी सफ़लता प्राप्त करते हैं।


द्वादश भाव में : -


जिन व्यक्तियों का गुरु द्वादश स्थान में मीन राशि का होता है, ऐसे जातक का भाग्योदय काफ़ी देर से तथा बहुत नुकसान उठाने के बाद ही होता है; फ़िर भी इन्हें कभी धन की कमी नहीं रहती। ये लोग धार्मिक क्रिया-कलापों में तथा सुख-शांति की चाहत में काफ़ी धन खर्च कर देते हैं। ऐसे लोग अपने शत्रुओं के साथ भी बड़प्पन दिखाते हैं।



आप सोच रहे होंगे कि आपको कुण्डली देखने का तरीका बता कर मैंने अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार ली है; तो ज्यादा खुश मत होइये, क्योंकि कोई भी ग्रह किस राशि में तथा किस भाव में बैठा है; इसके साथ-२ इस बात से भी प्रभावित होता है कि वह किस ग्रह के साथ बैठा है तथा उसे कौन-२ से ग्रह देख रहे हैं; साथ ही, ये भी कि वर्तमान् में आपकी कौन सी दशा चल रही है, जिसके लिए आपको मेरे पास ही आना होगा। परन्तु खुश होने को गालिब, ये लेख भी अच्छा ही है। .. :))


फ़िर मिलते हैं, विदा!


                                                                              आपकी शुभाकांक्षी
                                                                                       गायत्री

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