23 फ़रवरी, 2017

महाशिवरात्रि : महायोगी शिव





आप सभी महाशिवरात्रि को ‘शिव-पार्वती विवाह’ के रूप में ही जानते हैं। आज हम आपको शिवरात्रि के आध्यात्मिक महत्व से परिचित कराने जा रहे हैं। साथ ही, शिव के महायोगी स्वरूप के बारे में भी जानिये।

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भारतीय संस्कृति एक ऐसी संस्कृति है, जहाँ हर खुशी को तीज-त्योहार के रूप में मनाने का रिवाज है। यहाँ खुशियाँ किसी एक की ना होकर साझी हैं। महाशिवरात्रि भी इससे अछूती नहीं है। इसे मनाने को लेकर कई किवदंतियाँ प्रचलित हैं। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि सृष्टि के प्रारम्भ में शिव ने इस रात्रि को तांडव किया था; जिस कारण से इसे ‘कालरात्रि’ भी कहा जाता है। ज्यादातर लोगों की मान्यता इसे ‘शिव-पार्वती विवाह’ के रूप में मनाने की है।



महाशिवरात्रि को ‘शिव-पार्वती विवाह’ के रूप में मनाते हैं!



वैसे तो शिवरात्रि हर माह की कृष्ण पक्ष की चौदस / चौदहवीं तिथि को मनाई जाती है; लेकिन फ़ाल्गुन मास की शिवरात्रि को ‘महाशिवरात्रि’ के रूप में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन शिव तपस्या करते-२ पूर्ण रूप से स्थिर हो गये थे। आपको शायद ये जानकर आश्चर्य होगा कि शिव ही इस सृष्टि के प्रथम गुरु या आदि योगी माने जाते हैं। इसीलिए ये दिन आध्यात्मिक दृष्टि से काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता है।

गृहस्थ लोग जहाँ महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती के विवाह के रूप में मनाते हैं; वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिकता की राह पर अग्रसर लोगों के लिए ये दिन अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि इस दिन सूर्य और चन्द्र एक-साथ मिलकर मानव शरीर की आन्तरिक ऊर्जा को ऊपर की ओर उठाने में मदद करते हैं। अगर इस दिन व्यक्ति अपनी रीढ़ को सीधा रखकर जाग्रत अवस्था में ध्यान करे, तो उसके आध्यात्मिक चरम को पाने में ये दिन काफ़ी मददगार साबित हो सकता है।



महाशिवरात्रि आत्मिक जागरण हेतु अतिउत्तम दिन है!



आज विज्ञान ने भी इस तथ्य को मान लिया है कि प्रकृति से जुड़ी हर वस्तु, हर कण, अणु एवं परमाणु की संरचना में एक ही प्रकार की ऊर्जा का वास है। फ़र्क सिर्फ़ इतना ही है कि सृष्टि के आरम्भ में ही योगी जिस बात को जान गये थे; विज्ञान ने वहाँ तक पहुँचने में सदियाँ गुजार दीं। उससे भी बड़ी बात ये है कि योगियों ने इस ऊर्जा और सृष्टि की एकात्मकता को जीवंत अनुभव किया है तथा उसे आत्मसात भी किया है।



शिव सृष्टि के प्रथम योगी माने जाते हैं!



शिव ने ही सप्तऋषियों को योग का ज्ञान देकर इस परम्परा की शुरुआत की। सप्तऋषियों के द्वारा योग की दीक्षा जन-२ तक पहुँची। महाशिवरात्रि का दिन हमें खुद को जानने तथा योग के द्वारा स्वयं को कैलाश पर्वत की तरह अडिग और स्थिर होने का संदेश देता है; ताकि उस असीम ऊर्जा का हम साक्षात्कार करके उससे एकाकार हो सकें।


आपने अभी तक महाशिवरात्रि को चाहे जैसे भी मनाया हो; आइये इस बार इसे एक नये नजरिये से देखें और नये तरीके से मनाये।

ध्यान रखिए कि ये बेवसाइट ज्योतिष रूपी ज्ञान प्रदान करने के साथ-२ आपके आध्यात्मिक जागरण हेतु भी सहायक है।



फ़िर मिलते हैं, विदा!


                                                                               शुभेच्छा के साथ
                                                                                     गायत्री


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