21 फ़रवरी, 2017

अष्टकवर्ग : फ़लित की अनोखी विधा





आप में से कुछ-एक लोग ही ऐसे होंगे, जिन्होंने अष्टकवर्ग का नाम सुना होगा। अष्टकवर्ग भावों एवं ग्रहों के पूर्ण बल का आंकलन करके सटीक फ़ल-कथन के लिए गोचर का प्रयोग करने वाली अद्‌भुत पद्धति है।

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अष्टकवर्ग दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘अष्ट’ का शाब्दिक अर्थ आठ होता है। इस प्रकार अष्टकवर्ग का अर्थ हुआ : ‘आठ वर्ग’। अष्टकवर्ग पद्धति में लग्न एवं सात ग्रहों को मिलाकर आठ वर्ग बनाये जाते हैं। फ़िर इनके संयुक्त प्रभाव का कुण्डली के सन्दर्भ में अध्ययन किया जाता है। इसमें राहू-केतु का प्रयोग नहीं किया जाता है।



अष्टकवर्ग में आठ वर्ग बनाये जाते हैं!

 

 

अष्टकवर्ग से सम्बन्धित शब्दावली


अष्टकवर्ग में कुछ विशेष शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जिनका आपने पहले कभी नाम भी नहीं सुना होगा। आपको पहले इन शब्दों से जान-पहचान करनी होगी, वरना अष्टकवर्ग पद्धति शायद आपके पल्ले ही ना पड़े। आइये, मिलते हैं इन नये-नवेले शब्दों से : -

 

 

बिन्दु एवं रेखाएँ : -


अष्टकवर्ग बनाते समय ऐसा माना जाता है कि लग्न एवं सभी सात ग्रह कुछ शुभ एवं अशुभ ऊर्जाओं का उत्सर्जन करते हैं। इनमें शुभ ऊर्जाओं को ‘बिन्दु’ तथा अशुभ ऊर्जाओं को ‘रेखा’ से दर्शाते हैं।



‘बिन्दु’ शुभ ऊर्जाएँ दर्शाते हैं!



 

कक्ष्या : -


चूँकि राशि का मान ३० डिग्री होता है। अत: किसी राशि को आठ बराबर भागों में बाँटने पर उसके एक भाग का मान ३ डिग्री ४५ मिनट होगा, उसे ही अष्टकवर्ग में ‘कक्ष्या’ कहते हैं। प्रत्येक कक्ष्या का स्वामी एक निश्चित ग्रह होता है। इस प्रकार आठ कक्ष्याओं के स्वामी क्रमश: शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्रमा एवं लग्न होते हैं।

 

प्रस्थारक वर्ग : -


कुण्डली के सभी बारह भावों की आठों कक्ष्याओं में ग्रहों द्वारा प्रदत्त बिन्दुओं को एक तालिका के द्वारा दर्शाया जाता है, जिसे ‘प्रस्तार चक्र या प्रस्थारक वर्ग’ कहते हैं। प्रत्येक ग्रह के लिए अलग-२ प्रस्थारक वर्ग बनाया जाता है।

 

भिन्नाष्टक वर्ग : -


प्रस्थारक वर्ग तालिका में सभी ग्रहों द्वारा किसी विशेष राशि को प्रदत्त बिन्दुओं के कुल योग को कुण्डली के उसी राशि के भाव में अंकित करके ‘भिन्नाष्टक वर्ग’ तैयार किया जाता है। प्रत्येक ग्रह का एक अलग भिन्नाष्टक वर्ग होता है।



सर्वाष्टक वर्ग



 

सर्वाष्टक वर्ग : -


सभी ग्रहों द्वारा अपने-२ भिन्नाष्टक वर्ग में किसी विशेष राशि में दिये गये बिन्दुओं का कुल योग एक अन्य वर्ग या कुण्डली में दर्शाया जाता है, जिसे ‘सर्वाष्टक वर्ग’ कहते हैं।



मुझे पता है ये सब पढ़ने के बाद आपका सिर चक्कर खा रहा होगा और कुछ समझ में ना आने के लिए आप मुझे कोस रहे होंगे। पर भरोसा रखिए, ये बहुत ही काम की चीज है और दो-चार बार ध्यान से पढ़ने पर आपको समझ में आ जायेगी। इसके अलावा हम आगे भी अष्टकवर्ग पर और कई लेख लिखेंगे, जिससे शायद आपको इसे समझने में आसानी हो। अपना भरोसा हम पर बनाये रखिये।



फ़िर मिलते हैं, विदा!


                                                                                 आपकी शुभेच्छु
                                                                                        गायत्री

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