10 जुलाई, 2016

विवाह का कोई मुहूर्त नहीं मिल रहा, क्या करें?





हालांकि विवाह का मौसम अब लगभग खत्म हो चुका है, लेकिन नवम्बर में पुन: शुरु होने वाले इस मौसम के लिए लोग अभी से पंडित जी के पास जाकर मुहूर्त निकलवा रहे हैं; ताकि समय रहते मैरिज हॉल, कैटरिंग आदि को बुक कराया जा सके। लेकिन असली समस्या तो यहीं से प्रारम्भ होती है, क्योंकि कुछ लोगों को पंडित जी के यहाँ से मायूस होकर लौटना पड़ता है, क्योंकि मुहूर्त ही नहीं मिलता। वैसे ये तभी होता है, जब पंडित जी ईमानदार हों; वरना तो १०००/- रु० का नोट खिसकाने पर पंडित जी उनका भी मुहूर्त निकाल देते हैं, जिनकी कुण्डली में शादी का ही मुहूर्त ना हो। .. :))

वैसे जो लोग समझदार होंगे, उनके मन में अब तक ये प्रश्न आ चुका होगा कि क्या अलग-२ लोगों के लिए विवाह के अलग-२ मुहूर्त होते हैं? जी हाँ! और चूँकि विवाह में दो लोगों के लिए एक-साथ मुहूर्त देखना होता है, तो कभी कोई मुहूर्त लड़के के लिए शुभ नहीं होता, तो कभी कोई लड़की के लिए। कुछ-एक मुहूर्त ही ऐसे होते हैं, जो लड़के और लड़की दोनों के लिए शुभ हों। अक्सर ही दोनों को इस समस्या से दो-चार होना होता है। आपको भी फ़िल्म का वो डायलॉग तो याद ही होगा कि,

“इसी हफ़्ते शादी होगी, वरना इसके बाद अगले ६ महीने तक कोई मुहूर्त नहीं है।”



अक्सर लोग विवाह के लिए मुहूर्त ना मिलने की वजह से परेशान रहते हैं!



वैसे तो इस डायलॉग को सुनकर किसी के भी पसीने छूट सकते हैं, परन्तु हम आपके नहीं छूटने देंगे; क्योंकि हमारे पास एक ‘ठंडा-२ कूल-२’ आइडिया है। ज्योतिष में कुछ दिन ऐसे होते हैं, जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में ‘अनसूझी / अबूझ साइत’ कहते हैं। ये दिन अपने-आप में इतने मंगलकारी होते हैं कि इस दिन आप बिना पंडित से पूछे, कोई भी कार्य प्रारम्भ कर सकते हैं; यहाँ तक कि विवाह भी। आज हम आपको इन्हीं दिनों के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं : -

 

१.    देवोत्थान एकादशी : -


कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ‘देवोत्थान एकादशी’ के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार दीपावली के कुछ दिन पश्चात्‌ मनाया जाता है। इस दिन धूमधाम से तुलसी और शालिग्राम (विष्णु का एक रूप) का विवाह सम्पन्न किया जाता है। चार माह (चातुर्मास) तक देवों के शयन के पश्चात्‌ इस दिन देव जागते हैं। इसी उपलक्ष्य में यह उत्सव मनाया जाता है। देवोत्थान एकादशी के दिन से सभी शुभ कार्य जैसे; विवाह, जनेऊ संस्कार इत्यादि प्रारम्भ हो जाते हैं।



‘फ़ुलेरा दूज’ कृष्ण-राधा के प्रेम के प्रतीक रूप में विवाह के लिए शुभ मानी जाती है!



 

२.    वसन्त पंचमी : -


वसन्त पंचमी को श्री पंचमी या ऋषि पंचमी भी कहा जाता है। यह त्योहार माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन संगीत तथा विद्या की देवी माँ सरस्वती की आराधना की जाती है तथा यह दिन उनके जन्मोत्सव के रूप में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्योहार वसन्त ऋतु के आगमन का प्रतीक है तथा उसके स्वागत में पीले वस्त्र पहन कर हर्सोल्लास के साथ सम्पन्न किया जाता है। कुछ स्थानों पर इस दिन पतंग उड़ाने का भी रिवाज है।

 

३.    फ़ुलेरा दूज : -


यह त्योहार भारत के उत्तरी भाग में मनाया जाता है, इसे रंगों और फ़ूलों का त्योहार भी कहते हैं। फ़ुलेरा दूज फ़ाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है। यह पर्व विशेष रूप से मथुरा, वृंदावन के कृष्ण मंदिरों में सम्पन्न किया जाता है। इस दिन से होली का प्रारम्भ माना जाता है और लोग एक-दूसरे को सखा-भाव से गुलाल लगा कर कृष्ण-भक्ति में मगन रहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन कृष्ण, राधा व गोपियों के साथ फ़ूलों से होली खेलते थे व रासलीला रचाते थे।



‘अक्षय-तृतीया’ के दिन आप विवाह के लिए सोना खरीदने के साथ-२ विवाह भी कर सकते हैं!



 

४.    अक्षय तृतीया : -


अक्षय तृतीया को ‘आखा तीज’ भी कहते हैं। यह त्योहार बैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन किये गये प्रत्येक कार्य का फ़ल अक्षय होता है। इस दिन स्वर्ण खरीदने व कई तरह की वस्तुयें दान करने का प्रावधान है। कुछ स्थानों पर यह त्योहार परशुराम जयंती’ के रूप में भी मनाया जाता है।

 

५.    भड्डली नवमी : -


इसे भड्डरी नवमी या भड्डल नौमी भी कहा जाता है। यह उत्तर-भारत में लोक-पर्व के रूप में विख्यात है। भड्डली नवमी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को पड़ती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन नवीन या ताजे जल का पूजन करने से अतिवृष्टि के भय तथा अनावृष्टि की आशंका से रक्षा होती है। इस तिथि के तीसरे दिन यानि देवशयनी एकादशी से विवाह होना बन्द हो जाते हैं।


परन्तु एक बात का ध्यान रखिएगा कि इन दिनों के उपलब्ध होने से मुहूर्त की उपयोगिता कम नहीं हो जाती। इन दिनों में विवाह तभी करें, जब वास्तव में विवाह का कोई मुहूर्त ना निकल रहा हो।


फ़िर मिलते हैं। विदा!


                                                                           आपकी शुभाकांक्षी
                                                                                   गायत्री


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