26 जून, 2016

क्या मेरी कुण्डली में भी राजयोग है?





‘राजयोग’ शब्द सुनते ही आपकी आँखें चौड़ी हो गई ना? इस दुनिया में कौन ऐसा होगा, जिसे राजसी वैभव, ठाट-बाट की आकांक्षा ना हो; पर ये किस्मत में किसी-२ की ही होता है। आपके मन में भी अक्सर ये प्रश्न उठता होगा कि आखिर ऐसे कौन से योग होते हैं, जिनकी वजह से किसी व्यक्ति को सुख-वैभव नसीब होता है। चलिए आज हम आपको राजयोग की इसी रंगीली दुनिया में ले चलते हैं।

वैसे इस रंगीली दुनिया की चौखट पर कदम रखते ही मैं आपको जिस सच से रूबरू कराऊँगी, उससे आपकी चौड़ी हो गई आँखें वापस अपनी पूर्व स्थिति में आ जाएँगी। वो सच ये है कि वास्तविक रूप में राजयोग का तात्पर्य भोग-विलास या सुख-सुविधाओं से नहीं होता, बल्कि उस ‘मानसिक स्थिति’ से होता है, जो आपको वैभव, ऐश्वर्य और यश की अलौकिक अवस्था में ले जाता है।



‘राजयोग’ के आकर्षण से कोई नहीं बच पाता!



आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि ‘राजयोग’ जहाँ एक ओर उच्च धनाड्य एवं अधिकारी वर्ग की कुण्डलियों में पाया जाता है, वहीं दूसरी ओर एक भिखारी एवं एक सामान्य स्त्री की कुण्डली में भी उपस्थित हो सकता है। बस अन्तर ये होगा कि वह भिखारी समस्त भिखारियों का नेता होगा तथा उस स्त्री को उसके पिता ने एक ‘राजकुमारी’ की तरह एवं उसके पति ने एक ‘रानी’ की तरह रखा होगा।

वैसे एक अन्य बात जो यहाँ याद रखनी जरूरी है, वो ये है कि ‘राजयोग’ आपकी कुण्डली के जिस भाव में बनेगा; विलासिता और वैभव भी आपको उसी भाव से सम्बन्धित मिलेगा। साथ ही ये देखना भी जरूरी है कि राजयोग किन ग्रहों से मिलकर बना है तथा कितनी मजबूत स्थिति में है। जितनी उच्च अवस्था राजयोग की होगी, उतनी ही उस भाव से सम्बन्धित आपके वैभव की।



केन्द्र और त्रिकोंण के सम्बन्ध से राजयोग का निर्माण होता है!



 

राजयोग कैसे बनता है?


वैसे तो ज्योतिष के शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार कई ग्रह स्थितियाँ ऐसी हैं, जो राजयोग का सृजन करती हैं; परन्तु मुख्यत: केन्द्र और त्रिकोंण का सम्बन्ध श्रेष्ठ राजयोग का निर्माण करता है। इसमें नवम्‌ और दशम्‌ के सम्बन्ध द्वारा राजयोग का निर्माण प्रमुख स्थान रखता है एवं चतुर्थ और पंचम्‌ का सम्बन्ध इसके बाद आने वाला महत्वपूर्ण राजयोग है।

अगर थोड़ा विस्तृत शब्दों में कहें, तो किसी भी कुण्डली में अगर केन्द्र (१,४,७,१०) और त्रिकोंण (५,९) भावों के स्वामी किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध निर्मित करें, जैसे; किसी भी भाव में एकसाथ बैठे हों, एक-दूसरे के साथ स्थान-परिवर्तन करें, एक-दूसरे को देखें या केन्द्रेश त्रिकोंण में और त्रिकोंणेश केन्द्र स्थान में हो, तो ‘राजयोग’ की निर्मिति होती है।



राजयोग एक भिखारी से लेकर राजा तक किसी की भी कुण्डली में हो सकता है!



वैसे एक बात मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि राजयोग केवल यश और वैभव प्रदाता है, धन नहीं। धन के लिए कुण्डली में ‘धन-योग’ होना भी आवश्यक है; जिसके बारे में हम आगे किसी लेख में बात करेंगे। आपने कुछ लोगों को देखा होगा, जिनका दुनियां में बहुत नाम हुआ, परन्तु उनका पूरा जीवन अभावों में ही बीता।

वैसे मुझे अब लगने लगा है कि मैंने शायद लेख लिखने में कुशलता प्राप्त कर ली है और अपनी बात आपको अच्छे से समझा पाती हूँ; तभी आप लोग मुझसे कभी कोई प्रश्न नहीं पूछते। वैसे अगर ऐसा नहीं है, तो मेरी बात गलत साबित कीजिए। .. :))


फ़िर मिलते हैं। विदा!


                                                                               आपकी शुभाकांक्षी
                                                                                        गायत्री


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