22 मार्च, 2016

वास्तु में ढला पूजा-घर आपके आध्यात्मिक-स्तर को पोषित करता है!





‘पूजा-घर’ का नाम लेते ही आपके मन में एक ऐसे स्थान की छवि निर्मित होने लगती है, जहाँ बैठकर लोग अपने दकियानूसी एवं रूढ़िवादी विचारों को प्रश्रय देते हैं। हालांकि आप एक हद तक इसे सच मान सकते हैं; परन्तु इसके दूसरे पहलू पर नज़र डालें, तो पूजाघर ही वह स्थान है, जहाँ आप अपना मानसिक एवं आध्यात्मिक जागरण कर सकते हैं। यह एक ऐसा शांतिपूर्ण क्षेत्र होता है, जहाँ बैठकर आप अपने अन्तर्मन में झाँक सकते हैं। इसके अतिरिक्त इस स्थान का उपयोग आप हवन करने, मंत्रोच्चार करने, आध्यात्मिक पुस्तकों को पढ़ने, ध्यान लगाने, योगाभ्यास करने तथा शांतिपूर्वक बैठने के लिए भी कर सकते हैं।



पूजा-घर हमारे मानसिक एवं आध्यात्मिक उत्थान हेतु सर्वाधिक उपयुक्त स्थान है!



 

पूजा-घर के लिए उपयुक्त स्थान का चयन


पूजा-स्थल किसी भी घर में सबसे पवित्र स्थान होता है, चूँकि ज्योतिष में उत्तर-पूर्व ‘गुरु’ की दिशा है; अत: पूजा-घर ईशान कोंण में बनाना ही सर्वोत्तम रहता है। अगर किसी भी वजह से यहाँ सम्भव ना हो, तो आप इसे पूर्व / उत्तर दिशा में भी बना सकते है; परन्तु पूजा-स्थल कभी भी नैऋत्य कोंण या दक्षिण-दिशा में नहीं बनाना चाहिए।

सार्वजनिक मंदिर जो गाँव, कस्बे, कारखाने आदि में होते हैं, उन्हें ब्रह्म-स्थान में भी बनाया जा सकता है तथा इन्हें ऊपर से खुला भी रख सकते हैं। एक बात विशेष ध्यान रखें, सार्वजनिक मंदिर आवासीय-परिसर के आसपास ना होकर दूर ही होने चाहिए।



उत्तर-पूर्व (ईशान) अर्थात् गुरु की दिशा पूजा-स्थल के लिए सर्वश्रेष्ठ है!



 

पूजा-घर की बनावट से सम्बन्धित सुझाव


विश्व में सभी धर्म-स्थलों की छतें पिरामिड या गुम्बद के आकार की बनाई जाती हैं। पिरामिड या गुम्बद का मध्य-भाग ऊँचा होता है, जिसके आन्तरिक हिस्से से होकर विशाल मात्रा में आध्यात्मिक ऊर्जा अन्दर की ओर बहती है। ऊँची छतें पूजा-स्थल में आकाश-तत्व की वृद्धि करती हैं तथा ध्यान में सहायक होती हैं।

पूजा-घर का द्वार पूर्व / उत्तर की ओर खुलना चाहिए तथा इसके दरवाजे टिन, लोहे के ग्रिल, पी.वी.सी. तथा एल्यूमीनियम आदि से नहीं बने होने चाहिए। पूजा-घर का द्वार उत्तम-कोटि की लकड़ी (जैसे; चंदन, सागवान, चीड़, देवदार आदि) से दो कपाट वाला बनवाना चाहिए। प्राकृतिक प्रकाश के लिए दरवाजों और खिड़कियों में पारदर्शी रंगीन काँच का प्रयोग करना चाहिए।

पूजा-घर के फ़र्श और दीवारों पर सफ़ेद, पीले या हल्के नीले रंग का ही प्रयोग करना चाहिए। सफ़ेद रंग जहाँ सच्चाई, पवित्रता और भारहीनता का प्रतीक है; वहीं पीला रंग आध्यात्मिकता का। हल्का नीला रंग भी आध्यात्मिक जागरण में सहायक होता है।



पूजा-घर का द्वार उत्तम कोटि की लकड़ी से निर्मित एवं दो कपाट वाला होना चाहिए!



 

पूजा-घर में साजो-सामान की व्यवस्था कैसी हो?


पूजा-घर के ईशान / पूर्व / उत्तर क्षेत्र में एक चौकी रख कर ‘वेदी’ बनाएँ। वेदी दरवाजे के ठीक सामने नहीं होनी चाहिए। इस पर अपने आराध्य-देव को बैठायें। आराध्य-देव का मुख नैऋत्य / पश्चिम / दक्षिण की ओर रखें, ताकि पूजा करते समय आपका मुख शुभ दिशाओं ईशान / पूर्व / उत्तर की ओर रहे।

पूजा-घर में रखी मूर्तियाँ भग्नावस्था में नहीं होनी चाहिए और ना ही उनका मुख एक-दूसरे की ओर होना चाहिए। उन्हें दीवार से सटाकर रखने के बजाय एक-दो अंगुल दूर रखें। देवताओं की मूर्तियाँ किसी शुभ पदार्थ जैसे; चिकनी मिट्टी, बलुआ पत्थर, संगमरमर, ग्रेनाइट, सोना, चाँदी, काँसा, पीतल, अष्टधातु, ताँबा, हाथीदाँत, चंदन की लकड़ी आदि से बनी होनी चाहिए। लोहे, प्लास्टिक तथा रबड़ आदि से बनी मूर्तियाँ शुभ नहीं होतीं।

आग्नेय कोंण अग्नि हेतु उपयुक्त स्थान माना जाता है; अत: हवन-कुण्ड व दीपक को इसी स्थान पर प्रज्जवलित किया जाना चाहिए। बैठने हेतु आसन ‘कुशा या ऊन’ का ही उपयुक्त रहता है, जिसे नैऋत्य / पश्चिम / दक्षिण दिशा में ही बिछायें।



पूजा करते समय आपका मुख सदैव ईशान / पूर्व / उत्तर की ओर हो!



आध्यात्मिक ऊर्जा के दसों दिशाओं में विचरण हेतु पूजा-घर के ब्रह्म-स्थान को एकदम खाली रखें। पूजा करते समय वेदी पर सभी पंचमहाभूत तत्व उपस्थित होने चाहिए, जो निम्न प्रकार हैं : -

पृथ्वी तत्व  :  मिठाइयाँ, फ़ल
जल तत्व  :  गंगा-जल, तुलसी-दल सहित दही या दुग्ध
अग्नि तत्व  :  चार बाती युक्त देसी घी का दीपक
वायु तत्व  :  धूप-बत्ती, अगरबत्ती
आकाश तत्व  :  घंटी, मंत्रोच्चार


यदि आप धार्मिक या आध्यात्मिक संगीत सुनते हैं, तो म्यूजिक प्लेयर / सिस्टम को वायव्य कोंण में रखें। पूजा-स्थल को सदैव प्रकाशमान रहना चाहिए; साथ ही इस कक्ष को सदैव साफ़-सुथरा रखें। यहाँ गंदगी, कबाड़ या अवांक्षित वस्तुयें एकाग्रता भंग करने में सहायक होती हैं।



पूजन-सामग्री समस्त पंचभूत-तत्वों युक्त होनी चाहिए!




 

क्या ना करें!


पूजा-स्थल कभी भी शयन-कक्ष में नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि इससे दो परस्पर विरोधी ऊर्जाओं सात्विक एवं तामसिक का मेल होता है; जो घर की समृद्धि एवं सामन्जस्य के लिए उचित नहीं है। पूजा-घर में शिवलिंग एवं अपने पूर्वजों के चित्र ना रखें; साथ ही घने जंगलों, पशु-पक्षियों एवं महाभारत के दृश्यों के पोस्टर भी नहीं लगाने चाहिए। पूजा-घर में भारी वस्तुएँ ना रखें, क्योंकि ये हमारी ऊर्ध्व-गतिशील आध्यात्मिक ऊर्जा को नीचे खींचती हैं। पूजा-स्थल में तिजोरी, धन या कीमती वस्तुयें भी ना रखें, ये ध्यान को एकाग्र करने में बाधक हैं।


ये तो आप भी मानेंगे कि आध्यात्मिकता हमारी सर्वोत्तम निधि है, किन्तु इसका पोषण उपयुक्त वातावरण में ही हो सकता है; तो फ़िर अपने घर में एक कोना पूजा-घर को अवश्य दें।


आप अपनी किसी भी शंका के समाधान के लिए हमसे सम्पर्क करें, हम आपकी सहायता अवश्य करेंगे।



                                                                                    शुभेच्छा सहित
                                                                                          गायत्री



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