19 दिसंबर, 2015

वास्तु की ८ दिशाएँ और उनका महत्व




वास्तु में दिशाओं का अत्यन्त ही महत्व है। इसके अनुसार ८ दिशाएँ मानी गई हैं, जिनको ध्यान में रखकर ही भवन-निर्माण तथा आन्तरिक साज-सज्जा का कार्य किया जाता है। ऐसा करके सकारात्मक ऊर्जा के घर में प्रवेश तथा नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालने की व्यवस्था की जाती है। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से घर में खुशहाली आती है तथा घर के सदस्य प्रसन्न और स्वस्थ रहते हैं।

ये आठों दिशाएँ पंचतत्वों की बनी होती हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना अलग ही महत्व है; साथ ही प्रत्येक दिशा के लिए अलग-२ नियम-कायदे भी निर्धारित किए गए हैं। आइये.. इस लेख में आपको बताते हैं कि ये नियम कौन-२ से हैं, ताकि आपको भी स्वयं तथा अपने परिवार को खुशहाल बनाने में मदद मिल सके:-

 

१.    पूर्व दिशा :-

   
               चूँकि पूर्व दिशा में सूर्योदय होता है, अत: इस दिशा में घर का मुख्य दरवाजा, खिड़की और बालकनी होनी चाहिए; ताकि सकारात्मक ऊर्जा हमारे घर में प्रवेश कर सके। बच्चों को भी पढ़ते समय अपना मुख पूर्व दिशा की ओर करके बैठना चाहिए।

 

२.    पश्चिम दिशा :-


            इस दिशा के स्वामी वरुण देव माने जाते हैं। पश्चिम दिशा में सीढ़ियाँ होना शुभ होता है। इस दिशा में भारी निर्माण-कार्य भी करवाया जा सकता है। पश्चिम दिशा दर्पण लगाने के लिए उपयुक्त मानी जाती है।


वास्तु की विभिन्न दिशाएँ विभिन्न तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं!


३.    उत्तर दिशा :-


                इस दिशा में धन के देवता का वास माना जाता है। इसलिए यहाँ नकदी, धन व मूल्यवान वस्तुएँ रखने से धन-धान्य की बढ़ोत्तरी होती है। यहाँ बैठक की व्यवस्था कर सकते हैं और चाहें तो इसे खुला भी छोड़ सकते हैं। यहाँ बाथरूम या वॉशबेसिन भी बनवाया जा सकता है। इस दिशा में भूलकर भी बेडरूम नहीं बनवाना चाहिए तथा स्टोर रूम, स्टडी रूम या भारी मशीनरी भी यहाँ नहीं होनी चाहिए। इस दिशा में वास्तु-दोष होने से धन या कैरियर सम्बन्धी बाधाएँ आती हैं।

 

४.    दक्षिण दिशा :-


                  दक्षिण दिशा मृत्यु के देवता का स्थान माना जाता है। इस दिशा को बिल्कुल भी खुला नहीं छोड़ना चाहिए तथा हो सके, तो अधिक से अधिक भारी सामान यहाँ रखा जाना चाहिए। इस दिशा में बच्चों का कमरा, स्टडी रूम, बाथरूम और खिड़की नहीं होनी चाहिए।

 

५.    उत्तर-पूर्व या पूर्वोत्तर दिशा :-


                    उत्तर-पूर्व दिशा ईशान कोंण का प्रतिनिधित्व करती है। इस दिशा में जल तथा दैवीय शक्तियों का वास माना जाना है। पूर्वोत्तर दिशा की साफ़-सफ़ाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यहाँ मंदिर होना शुभ माना जाता है; चाहे तो बोरिंग, स्वीमिंग पूल तथा पानी से सम्बन्धित उपकरण भी यहाँ स्थापित कर सकते हैं। किसी भी अविवाहित कन्या को इस दिशा में नहीं सोना चाहिए, इससे उसके विवाह में विलम्ब हो सकता है।


प्रत्येक दिशा किसी विशेष-कार्य के लिए ही उपयुक्त मानी जाती है!


६.    दक्षिण-पूर्व दिशा :-


              दक्षिण-पूर्व दिशा या आग्नेय कोंण का प्रतिनिधित्व अग्नि करती है, इसलिए ये दिशा ऊर्जा से भरपूर होती है; फ़लत: इस दिशा में रसोईघर का होना बहुत अच्छा माना जाता है। यहाँ विद्युत-उपकरण रखे जा सकते हैं, परन्तु पानी से सम्बन्धित वस्तुएँ यहाँ नहीं रखनी चाहिए। इस दिशा में बैठकर भोजन ग्रहण करना अशुभ माना जाता है।

 

७.    उत्तर-पश्चिम दिशा :-


                उत्तर-पश्चिम दिशा या वायव्य कोंण का प्रतिनिधित्व वायु के हिस्से आता है। इस दिशा में खिड़की व रोशनदान होने से स्वास्थ्य-सम्बन्धी समस्याओं से छुटकारा मिलता है। घर की कन्या या मेहमानों के रहने की व्यवस्था इस दिशा में की जा सकती है। घर के नौकरों का कमरा भी यहाँ होना चाहिए। बेडरूम, गैरेज या गौशाला भी वायव्य कोंण में हो सकते हैं।

 

८.    दक्षिण-पश्चिम दिशा :-


                 दक्षिण-पश्चिम दिशा, नैऋत्य कोंण भी कहलाती है, जिसका प्रतिनिधित्व पृथ्वी तत्व करता है। इस दिशा में पेड़-पौधों का होना बहुत ही शुभ होता है, क्योंकि वे सारी नकारात्मक ऊर्जा सोख लेते हैं। इस दिशा में गृह-स्वामी का कमरा भी हो सकता है।

घर के मध्य का हिस्सा ‘ब्रह्मस्थान’ कहलाता है; इसे खुला ही रखना चाहिए, ताकि प्रकाश की समुचित व्यवस्था हो सके। यहाँ से ही सम्पूर्ण घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह सम्भव होता है। इस स्थान पर तुलसी का पौधा लगाना शुभ होता है।


एक विशेष ध्यान देने योग्य बात ये है कि वास्तु के उपायों को ध्यान में रखकर आप अपनी ज़िन्दगी में आमूल-चूल परिवर्तन तो ला सकते हैं; परन्तु पूर्णत: माकूल परिवर्तन तभी होगा, जब आप अपने नजरिए एवं जीवन-शैली में सकारात्मक परिवर्तन लायेंगे।


जीवन्त व ऊर्जावान् रहिए!


                                                                     शुभेच्छा के साथ
                                                                           गायत्री


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