16 दिसंबर, 2015

कुण्डली-मिलान कितना जरूरी?




आप शादी-शुदा हों या कुँवारे, परन्तु ज़िन्दगी में कभी ना कभी आपके मन में ये सवाल जरूर उठा होगा कि हमारे भारतीय समाज में जब सारी शादियाँ कुण्डली-मिलान के बाद ही सम्पन्न होती हैं, तो आखिर वो सफ़ल क्यों नहीं होतीं? परन्तु क्या आपने कभी ये भी सोचा है कि आखिर पण्डितों / ज्योतिषियों के द्वारा ये मिलान किया कैसे जाता है? शायद आप ये नहीं जानते कि ज्यादातर पण्डित / ज्योतिषी कुण्डली-मिलान की सही विधि से परिचित ही नहीं हैं। वे सिर्फ़ आपकी अज्ञानता का लाभ उठा कर अपना उल्लू सीधा करते हैं और आपको बेवकूफ़ बना कर अपनी जेबें भरते हैं


 

भारतीय समाज में प्रचलित कुण्डली-मेलापक व्यवस्था


हमारे समाज में विवाह से पूर्व ही लड़के-लड़की को दो अलग-२ भागों में बाँट दिया जाता है:-

एक वे, जो मंगली हैं;
दूसरे वे, जो मंगली नहीं हैं।

लोगों के मन में मंगली दोष का इतना भय व्याप्त है कि वे ये कल्पना ही नहीं कर सकते कि किसी सामान्य व्यक्ति की शादी किसी मंगली दोष वाले व्यक्ति से हो सकती है। परन्तु इस मंगली दोष का सच क्या है, इसे मैं आगे अपने एक लेख में विस्तार से बताउँगी।

इसके बाद अगर लड़के-लड़की की कुण्डली है, तो बस ३६ गुणों का मिलान करके पण्डित जी अपने कर्तव्य की इति श्री मान लेते हैं। परन्तु अगर दोनों में से किसी एक या दोनों की ही कुण्डली नहीं है, तो इसका भी उपाय है उनके पास; आखिर अपनी दक्षिणा ऐसे ही थोड़े ना जाने देंगे वे।



क्या हमारे समाज मे गुण-मिलान के सही तरीके प्रचलित हैं!


अब वे नाम से शादी ठहराने का तरीका निकालेंगे। लड़के-लड़की का राशि-नाम उपलब्ध है, तो ठीक; वरना वे प्रचलित नाम से मेल करा देंगे। प्रचलित नाम से मेल होने में कोई दिक्कत आई, तो फ़िर घर पे प्यार का कोई नाम जैसे; चुन्नू, मुन्नू, बंटी तो होगा ही... :))


 

कुण्डली-मिलान का वास्तविक एवं सही तरीका


कुण्डली-मिलान की आधारभूत व्यवस्था ‘३६ गुणों का मिलान’ के विषय को मैं आगे अपने किसी लेख में विस्तृत रूप से वर्णित करूँगी, क्योंकि यहाँ संक्षिप्त रूप में इतने गूढ़ विषय का वर्णन सम्भव है ही नहीं।


कुण्डली-मिलान ‘३६ गुणों’ के अलावा भी और बहुत कुछ है!


इस व्यवस्था के अतिरिक्त अन्य कई बातें प्रमुख हैं, जो किसी नवयुगल के सुखी वैवाहिक जीवन के लिए उत्तरदायी हैं। हालांकि ये ज्योतिषीय विश्लेषण से सम्बन्धित बातें हैं, जिन्हें समझने में आपको परेशानी हो सकती है या हो सकता है आपको समझ में ही ना आएँ। फ़िर भी संक्षेप में मैं उन्हें बताने का प्रयास कर रही हूँ :-

१.    लड़के एवं लड़की की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश एवं विवाह के कारक ग्रह शुक्र की स्थिति कैसी है? कहीं वे पीड़ित एवं पाप ग्रहों के प्रभाव में तो नहीं हैं?

२.    दोनों की कुण्डली में लग्न एवं सप्तम भाव का आपस में क्या सम्बन्ध है? क्या वे एक-दूसरे के लग्नेश / सप्तमेश से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध रखते हैं?

३.    वर-वधू की कुण्डली में अन्य ग्रहों का आपसी तालमेल भी देखना जरूरी है कि कहीं वे प्रतिकूल तो नहीं हैं; उनका अनुकूल होना वैवाहिक जीवन के सुखद भविष्य के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

४.    उपर्युक्त सभी बातों के अतिरिक्त विवाह हेतु एक उपयुक्त समय यानि मुहूर्त्त की उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता। उचित कुण्डली मिलान के बावजूद गलत समय पर हुआ विवाह आगामी जीवन में अड़चनें पैदा कर सकता है।

अत: उचित एवं सही प्रक्रिया से कुण्डली मिलान हेतु एक विज्ञ ज्योतिषी के पास जाना अत्यन्त आवश्यक है।

एक बात और जो मैं आपसे विशेष रूप से कहना चाहूँगी कि आप विवाह-पूर्व कुण्डली अवश्य मिलवाइये, परन्तु वैवाहिक जीवन सुखी तभी रहता है, जब पति-पत्नी में आपसी प्रेम एवं सामंजस्य हो और इसके लिए आपको ही प्रयास करना होगा।


ईश्वर आपके आगामी वैवाहिक जीवन को सुखी एवं समृद्ध बनावे!


                                                                    शुभकामनाओं सहित
                                                                               गायत्री


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