12 अप्रैल, 2017

घर में पेड़-पौधों को वास्तु के अनुसार कैसे लगायें?





क्या आप जानते हैं कि घर में कौन से पौधे लगाने चाहिए और कौन से नहीं? साथ ही ये भी कि कौन से पौधे घर में कहाँ लगायें? ये लेख इस बारे में आपकी काफ़ी मदद कर सकता है।

------------------------------------------------------------------------------------------------


ये तो आप लोग जानते ही हैं कि पेड़-पौधे हमारे जीवन के लिए कितने उपयोगी हैं। पर आप में से बहुत ही कम लोग ये जानते होंगे कि वास्तु के अनुसार नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के लिए भी इनका उपयोग किया जा सकता है। आज हम इसी बारे में बात करने जा रहे हैं।

जहाँ एक ओर पेड़-पौधे आस-पड़ोस की अशुभ ऊर्जा को घर के अन्दर आने से रोकने में सहायक होते हैं, वहीं दूसरी ओर श्मशान घाट, कूड़ा-घर, खंभों और कोनों से उत्पन्न नकारात्मक ऊर्जा से बचाव के लिए भी इनका उपयोग किया जा सकता है।

आजकल हमारे आसपास शहरी जीवन की वजह से हरियाली काफ़ी कम हो गई है और फ़्लैट सिस्टम के चलन की वजह से घर भी हवा और प्रकाश रहित तथा पूरी तरह से बन्द होते हैं। इन घरों में रहने वाले लोगों की प्रतिरोधक क्षमता काफ़ी कम होती है तथा वे अक्सर बीमार और अवसादग्रस्त रहने लगते हैं।



पेड़-पौधों को लगाने के भी कुछ कायदे हैं!



घर चाहे खुली हवादार जगह पर हों या फ़्लैट के रूप में एकदम बन्द; इनके अन्दर व आसपास पेड़-पौधों की उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता। परन्तु वास्तु के अनुसार पेड़-पौधों को लगाने के भी कुछ नियम-कायदे हैं, जिन्हें आप चाह कर भी नज़र-अन्दाज नहीं कर सकते।


इनमें से कुछ महत्वपूर्ण नियमों / वास्तु सुझावों से आज हम आपको परिचित कराने जा रहे हैं : -


१.    घर के अन्दर एवं आसपास शुभ एवं सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने वाले पेड़-पौधे ही लगाने चाहिए। जिनमें कुछ प्रमुख हैं : -
 
अशोक, नीम, तुलसी, कनेर, गुलमोहर, गेंदा, रात की रानी, चम्पा, मोगरा, कढ़ी-पत्ता, पुदीना आदि।

२.    बेरी, इमली, नींबू, बेल आदि पौधे धन का नाश करके दु:ख को बढ़ाते हैं।

३.    बेरी, कैक्टस, नागफ़नी आदि काँटेदार पेड़-पौधे हमारे शत्रुओं को बढ़ाते हैं।

४.    बरगद, महुआ, पपीता एवं अन्य दूधदार पेड़ धन का नाश करते हैं।

५.    जामुन, आम, कटहल, केला एवं अन्य फ़लदार वृक्ष बच्चों के लिए हानिकारक होने के साथ-२ कई प्रकार से नुकसान पहुँचाते हैं।

६.    मंदिर, कब्रिस्तान, नदी के किनारे एवं मार्ग के आस-पास से पौधे उखाड़कर घर में ना लगायें।

७.    पेड़ों को भाद्रपद या माघ मास में ही काटना चाहिए, जब चन्द्रमा पुनर्वसु, हस्त, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़ या श्रवण नक्षत्र में गोचर कर रहा हो।



काँटेदार पेड़-पौधे लगाने से हमारे शत्रुओं की संख्या बढ़ती है!




ध्यान रखने योग्य अन्य बातें

---------------------------------------------


१.     घर में बोनजाई पौधे ना लगायें, ये दबाने और कुचलने के प्रतीक हैं तथा नैसर्गिक वृद्धि या प्रगति में बाधा पहुँचाते हैं।

२.     मुख्य द्वार के एकदम सामने बड़ा पेड़ समृद्धि के आगमन को रोकता है।

३.     कार्यालय या स्टडी में एकाध काँटेदार पौधा (जैसे, लाल गुलाब) रखने से सृजनात्मकता एवं सक्रियता बढ़ती है; परन्तु उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्ति के लिए ये पौधे खतरनाक साबित हो सकते हैं।

४.     रबड़ या बरगद जैसे गहरे हरे, चिकने और गोल पत्तों वाले तामसी पौधे अगर आसपास हों; तो मूर्खता एवं आलसीपन को बढ़ावा देते हैं।



घर में बोनजाई पौधे नहीं लगाना चाहिए!



५.     घर के निकट कब्रिस्तान होने पर घर के चारों तरफ़ पेड़ों की बाड़ अवश्य लगानी चाहिए। ये हमें बीमारी एवं अवसाद से बचाती है।

६.     अगर घर में तुलसी तथा अन्य पौधे बार-२ सूख जायें, तो इसे घर में अशुभ ऊर्जाओं की उपस्थिति की चेतावनी की तरह देखें और इस पर ध्यान दें।

७.     घर के आगे की ओर छोटे पेड़-पौधे तथा पीछे की ओर अपेक्षाकृत बड़े पेड़ लगायें।

८.     घर में बेलों को कभी भी मुख्य भवन या पेड़ों पर ना चढ़ायें। इसके लिए चहारदीवारी का प्रयोग करें, वो भी भारी दिशा की ओर वाली।



आपने तो ये लेख पढ़ लिया, पर हो सकता है आपके दोस्तों और निकट सम्बन्धियों को भी इसके बारे में कोई जानकारी ना हो, तो हो सके तो उनकी भी मदद करें या उन्हें यहाँ का पता दे दें।



फ़िर मिलते हैं, विदा!



                                                                        शुभेच्छा के साथ
                                                                              गायत्री


--------------------------------------------------------------------------------------------------


अन्य सम्बन्धित लेख :


वास्तु के अनुसार घर में लगाये जाने वाले चित्र / पोस्टर 

अपनी पसन्द नहीं, वास्तु के अनुसार सही रंग चुनें!

 वास्तु आखिर है क्या?

 वास्तु की ८ दिशाएँ और उनका महत्व

 वास्तु-सुझाव : फ़्लैट खरीदने से पहले कुछ बातें अवश्य ध्यान रखें!


                                      ********

12 मार्च, 2017

क्या गुण-मिलान के समय ‘कूट-दोष का परिहार’ सम्भव है?





अक्सर विवाह के समय कुण्डलियों में गुण-मिलान करते समय लोग परिहारों का ध्यान नहीं रखते और इस वजह से कई विवाह होते-२ रह जाते हैं। आइये इस लेख में हम कूट-दोषों के परिहारों के कुछ सूत्रों के बारे में जानते हैं।

------------------------------------------------------------------------------------------------


मेरे पिछले एक लेख में आपने ‘३६ गुणों के मिलान’ के बारे में जाना, जिसमें आपने जाना कि कूट-मिलान के अन्तर्गत वर और कन्या के किन-२ गुणों का मिलान किया जाता है। उस लेख में एक जगह ‘परिहारों’ का जिक्र आया था और मैंने आपको बताया था कि इण्टरनेट पर कुण्डली-मिलान के लिए मुफ़्त सेवा प्रदान करने वाले परिहारों का ध्यान नहीं रखते। आज हम इन्हीं परिहारों के बारे में आप से बात करेंगे।

अष्टकूट मिलान के समय प्रत्येक कूट का मिलान होने पर पूर्व-निर्धारित अंक प्रदान किये जाते हैं। अगर किसी भी प्रकार का कूट-दोष हो, तो उसमें सम्बन्धित अंक नहीं मिलते। इसके लिए परिहारों की व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत कुछ सूत्र दिये गये हैं। अगर आप उन सूत्रों में दी गई किन्हीं शर्तों को पूरा करते हैं, तो आपका सम्बन्धित कूट-दोष समाप्त हो जाता है और आपको उस कूट से सम्बन्धित पूरे या कुछ अंक प्राप्त हो जाते हैं। किन कूट-दोषों का निवारण किन सूत्रों से होता है तथा फ़लस्वरूप आपको कितने अंक प्राप्त होते हैं, इनका वर्णन निम्न तालिका में दिया गया है। सूत्रों की विस्तार से व्याख्या हम आगे इसी लेख में करेंगे। जरा इस तालिका पर गौर फ़रमाइये : -






 

 

 परिहार सम्बन्धी सूत्रों की विस्तारित व्याख्या

----------------------------------------------------------------------------


 (१)     राशीश मैत्री : -



यदि वर और कन्या की राशियों के स्वामी आपस में मित्र हों, तो निम्न दोष नष्ट हो जाते हैं या उनका परिहार हो जाता है। ये दोष इस प्रकार हैं : -
वर्ण-दोष, वर्ग-दोष, तारा दोष, योनि-दोष, गण-दोष, भकूट-दोष (द्विर्द्वादश, षडाष्टक, नव-पंचक) तथा नाड़ी-दोष।

 

(२)     राशीश एकता : -



यदि वर और कन्या की राशि का स्वामी एक ही ग्रह हो; तो भी उन सभी दोषों का परिहार सम्भव है, जिनका जिक्र राशीश-मैत्री के समय किया गया था। ये राशियाँ एवं उनके स्वामी-ग्रह इस प्रकार हैं : -
मेष और वृश्चिक (मंगल), वृष और तुला (शुक्र), मिथुन और कन्या (बुध), धनु और मीन (गुरु) तथा मकर और कुम्भ (शनि)।

 

(३)     नवमांशेष मैत्री तथा नवमांशेष एकता : -



यदि वर और कन्या के नवांश के स्वामी आपस में मित्र हों या एक ही हों, तो उनके ग्रह-मैत्री सम्बन्धी दोष को दूर किया जा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि वर और कन्या के राशि-स्वामी या नवांश-स्वामी का आपस में मित्र होना या एक ही होना आवश्यक है।

 

(४)     सद्‌भकूट : -



यदि कुण्डली भकूट-दोष से रहित हो, तो सद्‌भकूट कहलाता है। सद्‌भकूट में वर और कन्या की राशियाँ परस्पर ३/११, ४/१०, १/७ अथवा एक ही होती हैं। सद्‌भकूट भी वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह-मैत्री तथा गण-दोष को समाप्त करता है।


यदि वर और कन्या की एक ही राशि हो, तो उपर्युक्त दोषों के साथ-२ नाड़ी दोष भी नष्ट हो जाता है। नाड़ी दोष के ३ परिहार इस प्रकार हैं : -

   (अ)  वर और कन्या की राशि एक परन्तु नक्षत्र अलग-२ हों,
 
   (ब)  वर और कन्या का नक्षत्र एक परन्तु राशियाँ भिन्न-२ हों,
  
   (स)  वर और कन्या का नक्षत्र एक ही हो, परन्तु चरण अलग-२ हों।



उपर्युक्त परिहारों को देखने के बाद आप समझ ही गये होंगे कि ना जाने कितनी शादियाँ इनकी जानकारी के अभाव में होते-२ रह जाती हैं। आशा करते हैं, आप इस जानकारी से अवश्य लाभान्वित होंगे। अगर आपकी कोई भी शंका हो, तो आप किसी भी माध्यम से हमसे सम्पर्क कर सकते हैं।


फ़िर मिलते हैं, विदा!


                                                                            आपकी शुभेच्छु
                                                                                   गायत्री

---------------------------------------------------------------------------------------------

अन्य सम्बन्धित लेख :


कूट-मिलान (36 गुणों का मिलान) आखिर है क्या?

कुण्डली मिलान कितना जरूरी?

मंगली होना अभिशाप नहीं!
                  
मेरा विवाह कब होगा?

विवाह का कोई मुहूर्त नहीं मिल रहा, क्या करें?
                                



                               ********

01 मार्च, 2017

‘मिथुन’ लग्न की कुण्डली में ‘मंगल’ का फ़ल





अगर आपकी कुण्डली ‘मिथुन’ लग्न की है और आपको ये भी पता है कि उसमें ‘मंगल’ किस भाव में बैठा है, तो ये लेख आपको जरूर पढ़ना चाहिए; क्योंकि इसमें हम इसी बारे में बात कर रहे हैं।

---------------------------------------------------------------------------------------------------


अब तक आप मेष और वृष लग्न की कुण्डली में क्रमश: गुरु और शनि के फ़ल के बारे में पढ़ चुके हैं। आज की कड़ी में ‘मिथुन’ लग्न की कुण्डली में ‘मंगल’ ग्रह का भाव-फ़ल लेकर मैं फ़िर आपके सामने प्रस्तुत हूँ।

‘मिथुन’ लग्न के लिए मंगल एक तरफ़ जहाँ लाभेश (ग्यारहवें भाव का स्वामी) होता है, वहीं दूसरी तरफ़ षष्ठेश भी होता है। यानि ऋण और लाभ दोनों लेकर आता है। अब आपकी किस्मत में क्या है, ये इस लेख को पढ़कर जानते हैं।



मिथुन लग्न के लिए मंगल ऋण और लाभ दोनों का वायस बनता है!



‘मिथुन’ लग्न की कुण्डली में ‘मंगल’ ग्रह के फ़ल को आप निम्न प्रकार जान सकते हैं : -

 

पहले भाव में : -


अगर मंगल पहले भाव में हो, तो जातक कूटनीति एवं चालाकियों से बहुत ज्यादा धन कमाता है और मस्ती के साथ ज़िन्दगी बिताता है। ऐसे व्यक्ति अपने शत्रु को दबाने में तो कामयाब हो जाते हैं, परन्तु अपनी पत्नी से उनकी पटरी नहीं खाती। ये लोग होशियार होने के साथ-२ कुछ रूखे भी होते हैं तथा इनका शरीर रोग-ग्रस्त होता है।

 

 

दूसरे भाव में : -


कर्क राशि में मंगल नीच का होता है। अत: दूसरे भाव में नीच का मंगल एक ओर जहाँ धन-संग्रह में परेशानी दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर कुटुम्ब की हानि भी करवाता है। ऐसे लोगों को परिश्रम करना बन्धन जैसा लगता है, ये गुप्त तरीकों से यहाँ-वहाँ करके ही पैसा कमाना चाहते हैं। ऐसे लोगों को ननसाल पक्ष से भी कोई विशेष लाभ प्राप्त नहीं होता।

 

 

तीसरे भाव में : -


तीसरे भाव का मंगल खून में जोश पैदा करता है। ऐसे लोग अपनी हेकड़ी और मेहनत के बल पर जहाँ व्यवसाय में खूब धन कमाते हैं, वहीं दुश्मनों पर भी रौब गाँठ कर रखते हैं। ऐसे लोग राज-समाज, ननसाल पक्ष, एवं बीमारियों पर भी अपना अच्छा-खासा प्रभाव रखते हैं।

 

 

चौथे भाव में : -


‘मंगल’ भूमि, मकान, जमीन-जायदाद आदि का कारक होता है। अत: लाभ भाव का स्वामी होकर चौथे भाव में बैठा मंगल इन माध्यमों से कमाई के साधन पैदा करवाता है। ऐसे लोग अपने शत्रुओं से घबराते नहीं हैं, उल्टे वे उन्हीं से अपना फ़ायदा निकाल लेते हैं। इन्हें माता के सम्बन्ध में सुख और दु:ख दोनों उठाने पड़ते हैं।



तीसरे भाव में मंगल हेकड़ी से धन दिलाता है!



 

पाँचवे भाव में : -


अगर मंगल पंचम भाव में हो, तो व्यक्ति अपनी बुद्धि का उपयोग दूसरों पर गुस्सा निकालने व उनसे फ़ायदा उठाने में करता है। इन व्यक्तियों के बच्चे काफ़ी जिद्दी व हठीले होते हैं। ऐसे लोग अपना जीवन मस्ती में बिताते हैं तथा अपने दुश्मन को सहारा देने के बहाने उनसे भी फ़ायदा उठाते हैं।

 

छठे भाव में : -


जिन व्यक्तियों का मंगल छठे स्थान में वृश्चिक राशि में बैठा हो, उनकी देह कमजोर एवं रोग-ग्रस्त होती है। ऐसे लोग अपने शत्रुओं पर तो अपना दमखम दिखाते ही हैं; साथ ही, लाभ निकालने के लिए भी हेकड़ी दिखाने से बाज नहीं आते। ऐसे व्यक्ति अपने ननसाल पक्ष के भी प्रभाव का काफ़ी फ़ायदा उठाते हैं।

 

सातवें भाव में : -


मंगल यहाँ षष्ठेश होकर द्वितीय भाव को देख रहा है, अत: धन-संग्रह के मामले में जातक को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। चूँकि छठा भाव झगड़े-झंझट का एवं द्वितीय भाव कुटुम्ब का भी होता है, अत: परिवार में भी झगड़े एवं विवाद चलते ही रहते हैं। सातवें स्थान में बैठकर मंगल स्त्री से झगड़ा करवाता है तथा भोगादि एवं देह के मामले में रोग से भी सामना होता है।



नवें भाव का मंगल पूजा-पाठ में अनाप-शनाप खर्च करवाता है!



 

आठवें भाव में : -


मकर राशि में मंगल उच्च का होता है। आठवें घर में मकर का मंगल आयु में वृद्धि तथा दैनिक जीवन में बड़ा भारी प्रभाव देता है। ऐसा व्यक्ति अपने दुश्मनों से कूटनीति एवं छिपी हुई शक्तियों से काम निकालता है। ये लोग भाई-बहन से वैमनस्यता रखते हैं। इसी वजह से इन्हें अक्सर परिवार की कमी खलती है।

 

नवें भाव में : -


नवें भाव में कुंभ राशि का मंगल व्यक्ति को भाग्य के बल पर पैसा और प्रभाव दिलवाता है। ऐसे लोग ईश्वर में झूठी आस्था रखते हैं तथा दिखावा करने के लिए पूजा-पाठ के नाम पर अपना पैसा और वक्त बर्बाद करते हैं। इनके खर्च बहुत ज्यादा होते हैं, जिससे इन्हें अक्सर परेशानी का सामना करना पड़ता है।

 

दसवें भाव में : -


जिन व्यक्तियों के दसवें भाव में मीन राशि का मंगल हो, वे अपने परिश्रम और अच्छे कर्मों के द्वारा राज-समाज से मान और इज्जत के साथ-२ धन भी प्राप्त करते हैं। ये अपना कारोबार भी करते हैं, तो मेहनत और आत्मबल के द्वारा उसे काफ़ी ऊँचाइयों तक ले जाते हैं। ऐसे लोग दिमाग के मामले में तो काफ़ी तेज होते हैं, परन्तु माता के सुख में किसी ना किसी प्रकार की न्यूनता अवश्य रहती है।



ग्यारहवें भाव में मंगल हो, तो बाधायें इनके सामने सिर झुकाती हैं!



 

ग्यारहवें भाव में : -


ग्यारहवें भाव में स्वराशि मेष का मंगल छप्पर फ़ाड़ के धन-सम्पत्ति देता है, परन्तु ये लोग उसे संचित करने के मामले में कच्चे साबित होते हैं तथा पानी की तरह अपना सारा पैसा बहा देते हैं। इन लोगों के लिए दिक्कतों तथा मुसीबतों से छुटकारा पाना बायें हाथ का खेल होता है।

 

बारहवें भाव में : -


जिन व्यक्तियों के बारहवें भाव में वृष राशि का मंगल हो, उन्हें आमदनी व लाभ के मामले में काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोगों को इन्द्रिय सम्बन्धी कुछ विकार भी होता है। अपने बहन-भाइयों से तो इनकी खटपट चलती ही रहती है तथा अपनी पत्नी से भी इनकी कोई खास नहीं बनती।


आज तो मिथुन लग्न वालों का दिन था; परन्तु आप परेशान मत होइये, कल आपका भी दिन आयेगा।


फ़िर मिलते हैं, विदा!


                                                                           आपकी शुभाकांक्षी
                                                                                    गायत्री


--------------------------------------------------------------------------------------------------


अन्य सम्बन्धित लेख :


‘मेष’ लग्न की कुण्डली के विभिन्न भावों में ‘गुरु’ के स्थित होने का फ़ल

‘वृष’ लग्न की कुण्डली के विभिन्न भावों में ‘शनि’ का फ़ल


                                  ********


23 फ़रवरी, 2017

महाशिवरात्रि : महायोगी शिव





आप सभी महाशिवरात्रि को ‘शिव-पार्वती विवाह’ के रूप में ही जानते हैं। आज हम आपको शिवरात्रि के आध्यात्मिक महत्व से परिचित कराने जा रहे हैं। साथ ही, शिव के महायोगी स्वरूप के बारे में भी जानिये।

-------------------------------------------------------------------------------------------------


भारतीय संस्कृति एक ऐसी संस्कृति है, जहाँ हर खुशी को तीज-त्योहार के रूप में मनाने का रिवाज है। यहाँ खुशियाँ किसी एक की ना होकर साझी हैं। महाशिवरात्रि भी इससे अछूती नहीं है। इसे मनाने को लेकर कई किवदंतियाँ प्रचलित हैं। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि सृष्टि के प्रारम्भ में शिव ने इस रात्रि को तांडव किया था; जिस कारण से इसे ‘कालरात्रि’ भी कहा जाता है। ज्यादातर लोगों की मान्यता इसे ‘शिव-पार्वती विवाह’ के रूप में मनाने की है।



महाशिवरात्रि को ‘शिव-पार्वती विवाह’ के रूप में मनाते हैं!



वैसे तो शिवरात्रि हर माह की कृष्ण पक्ष की चौदस / चौदहवीं तिथि को मनाई जाती है; लेकिन फ़ाल्गुन मास की शिवरात्रि को ‘महाशिवरात्रि’ के रूप में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन शिव तपस्या करते-२ पूर्ण रूप से स्थिर हो गये थे। आपको शायद ये जानकर आश्चर्य होगा कि शिव ही इस सृष्टि के प्रथम गुरु या आदि योगी माने जाते हैं। इसीलिए ये दिन आध्यात्मिक दृष्टि से काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता है।

गृहस्थ लोग जहाँ महाशिवरात्रि को शिव-पार्वती के विवाह के रूप में मनाते हैं; वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिकता की राह पर अग्रसर लोगों के लिए ये दिन अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि इस दिन सूर्य और चन्द्र एक-साथ मिलकर मानव शरीर की आन्तरिक ऊर्जा को ऊपर की ओर उठाने में मदद करते हैं। अगर इस दिन व्यक्ति अपनी रीढ़ को सीधा रखकर जाग्रत अवस्था में ध्यान करे, तो उसके आध्यात्मिक चरम को पाने में ये दिन काफ़ी मददगार साबित हो सकता है।



महाशिवरात्रि आत्मिक जागरण हेतु अतिउत्तम दिन है!



आज विज्ञान ने भी इस तथ्य को मान लिया है कि प्रकृति से जुड़ी हर वस्तु, हर कण, अणु एवं परमाणु की संरचना में एक ही प्रकार की ऊर्जा का वास है। फ़र्क सिर्फ़ इतना ही है कि सृष्टि के आरम्भ में ही योगी जिस बात को जान गये थे; विज्ञान ने वहाँ तक पहुँचने में सदियाँ गुजार दीं। उससे भी बड़ी बात ये है कि योगियों ने इस ऊर्जा और सृष्टि की एकात्मकता को जीवंत अनुभव किया है तथा उसे आत्मसात भी किया है।



शिव सृष्टि के प्रथम योगी माने जाते हैं!



शिव ने ही सप्तऋषियों को योग का ज्ञान देकर इस परम्परा की शुरुआत की। सप्तऋषियों के द्वारा योग की दीक्षा जन-२ तक पहुँची। महाशिवरात्रि का दिन हमें खुद को जानने तथा योग के द्वारा स्वयं को कैलाश पर्वत की तरह अडिग और स्थिर होने का संदेश देता है; ताकि उस असीम ऊर्जा का हम साक्षात्कार करके उससे एकाकार हो सकें।


आपने अभी तक महाशिवरात्रि को चाहे जैसे भी मनाया हो; आइये इस बार इसे एक नये नजरिये से देखें और नये तरीके से मनाये।

ध्यान रखिए कि ये बेवसाइट ज्योतिष रूपी ज्ञान प्रदान करने के साथ-२ आपके आध्यात्मिक जागरण हेतु भी सहायक है।



फ़िर मिलते हैं, विदा!


                                                                               शुभेच्छा के साथ
                                                                                     गायत्री


---------------------------------------------------------------------------------------------


 अन्य सम्बन्धित लेख :


 महामृत्युंजय मंत्र को भी जानें!



                                                        ********

21 फ़रवरी, 2017

अष्टकवर्ग : फ़लित की अनोखी विधा





आप में से कुछ-एक लोग ही ऐसे होंगे, जिन्होंने अष्टकवर्ग का नाम सुना होगा। अष्टकवर्ग भावों एवं ग्रहों के पूर्ण बल का आंकलन करके सटीक फ़ल-कथन के लिए गोचर का प्रयोग करने वाली अद्‌भुत पद्धति है।

-------------------------------------------------------------------------------------------------


अष्टकवर्ग दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘अष्ट’ का शाब्दिक अर्थ आठ होता है। इस प्रकार अष्टकवर्ग का अर्थ हुआ : ‘आठ वर्ग’। अष्टकवर्ग पद्धति में लग्न एवं सात ग्रहों को मिलाकर आठ वर्ग बनाये जाते हैं। फ़िर इनके संयुक्त प्रभाव का कुण्डली के सन्दर्भ में अध्ययन किया जाता है। इसमें राहू-केतु का प्रयोग नहीं किया जाता है।



अष्टकवर्ग में आठ वर्ग बनाये जाते हैं!

 

 

अष्टकवर्ग से सम्बन्धित शब्दावली


अष्टकवर्ग में कुछ विशेष शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जिनका आपने पहले कभी नाम भी नहीं सुना होगा। आपको पहले इन शब्दों से जान-पहचान करनी होगी, वरना अष्टकवर्ग पद्धति शायद आपके पल्ले ही ना पड़े। आइये, मिलते हैं इन नये-नवेले शब्दों से : -

 

 

बिन्दु एवं रेखाएँ : -


अष्टकवर्ग बनाते समय ऐसा माना जाता है कि लग्न एवं सभी सात ग्रह कुछ शुभ एवं अशुभ ऊर्जाओं का उत्सर्जन करते हैं। इनमें शुभ ऊर्जाओं को ‘बिन्दु’ तथा अशुभ ऊर्जाओं को ‘रेखा’ से दर्शाते हैं।



‘बिन्दु’ शुभ ऊर्जाएँ दर्शाते हैं!



 

कक्ष्या : -


चूँकि राशि का मान ३० डिग्री होता है। अत: किसी राशि को आठ बराबर भागों में बाँटने पर उसके एक भाग का मान ३ डिग्री ४५ मिनट होगा, उसे ही अष्टकवर्ग में ‘कक्ष्या’ कहते हैं। प्रत्येक कक्ष्या का स्वामी एक निश्चित ग्रह होता है। इस प्रकार आठ कक्ष्याओं के स्वामी क्रमश: शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्रमा एवं लग्न होते हैं।

 

प्रस्थारक वर्ग : -


कुण्डली के सभी बारह भावों की आठों कक्ष्याओं में ग्रहों द्वारा प्रदत्त बिन्दुओं को एक तालिका के द्वारा दर्शाया जाता है, जिसे ‘प्रस्तार चक्र या प्रस्थारक वर्ग’ कहते हैं। प्रत्येक ग्रह के लिए अलग-२ प्रस्थारक वर्ग बनाया जाता है।

 

भिन्नाष्टक वर्ग : -


प्रस्थारक वर्ग तालिका में सभी ग्रहों द्वारा किसी विशेष राशि को प्रदत्त बिन्दुओं के कुल योग को कुण्डली के उसी राशि के भाव में अंकित करके ‘भिन्नाष्टक वर्ग’ तैयार किया जाता है। प्रत्येक ग्रह का एक अलग भिन्नाष्टक वर्ग होता है।



सर्वाष्टक वर्ग



 

सर्वाष्टक वर्ग : -


सभी ग्रहों द्वारा अपने-२ भिन्नाष्टक वर्ग में किसी विशेष राशि में दिये गये बिन्दुओं का कुल योग एक अन्य वर्ग या कुण्डली में दर्शाया जाता है, जिसे ‘सर्वाष्टक वर्ग’ कहते हैं।



मुझे पता है ये सब पढ़ने के बाद आपका सिर चक्कर खा रहा होगा और कुछ समझ में ना आने के लिए आप मुझे कोस रहे होंगे। पर भरोसा रखिए, ये बहुत ही काम की चीज है और दो-चार बार ध्यान से पढ़ने पर आपको समझ में आ जायेगी। इसके अलावा हम आगे भी अष्टकवर्ग पर और कई लेख लिखेंगे, जिससे शायद आपको इसे समझने में आसानी हो। अपना भरोसा हम पर बनाये रखिये।



फ़िर मिलते हैं, विदा!


                                                                                 आपकी शुभेच्छु
                                                                                        गायत्री

                                              ********

11 फ़रवरी, 2017

‘वृष’ लग्न की कुण्डली के विभिन्न भावों में ‘शनि’ का फ़ल





अगर आप का जन्म वृष लग्न में हुआ है और आप अपनी कुण्डली में स्थित ‘शनि’ ग्रह का प्रभाव आपके जीवन पर क्या होगा, ये जानने की इच्छा रखते हैं; तो ये लेख आपकी मदद कर सकता है।

----------------------------------------------------------------------------------------------------


हम विभिन्न लग्न की कुण्डलियों में स्थित विभिन्न ग्रहों के भविष्यफ़ल पर आधारित लेखों की शृंखला पर काम कर रहे हैं। इसी शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है, वृष लग्न की कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘शनि’ ग्रह का फ़ल।

वैसे भी शनि का ग्रहों के बीच एक महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन वृष लग्न के लिए तो ये ‘योगकारक’ होता है। वृष लग्न की कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित शनि क्या फ़ल देगा, इसे निम्न प्रकार जाना जा सकता है : -

 

प्रथम भाव में : -


पहले भाव में बैठकर शनि ज़िद्दी बना देता है, लेकिन कड़ी मेहनत भी करवाता है। ऐसा व्यक्ति बड़े प्रभावशाली ढंग से जीवन व्यतीत करता है तथा पिता एवं राज-व्यवस्था से इज्जत प्राप्त करता है। कभी-२ भाई-बहनों के स्थान में थोड़ी अरुचि तथा स्त्री-स्थान में थोड़ी वैमनस्यता भी दिखाई देती है।



वृष लग्न वाले जातकों के लिए शनि ‘योगकारक’ होता है!



द्वितीय भाव में : -


द्वितीय स्थान में शनि होने पर व्यक्ति राजकीय सम्बन्धों तथा पिता से अकूत धन-सम्पत्ति तो प्राप्त करता है, परन्तु अन्दर ही अन्दर कुछ बन्धन सा भी महसूस करता है। ऐसे लोग माता से कुछ असंतोष तथा मकान-भूमि आदि की थोड़ी कमी भी महसूस करते हैं।

 

 

तृतीय भाव में : -


जिस व्यक्ति के तीसरे स्थान में कर्क राशि का शनि हो, ऐसे व्यक्ति अपने परिश्रम से ऊँचाइयों पर पहुँचते हैं। ये लोग बहुत ही हाज़िर-जवाब होते हैं। ऐसे लोग खर्च करने के मामले में लापरवाही बरतते हैं, परन्तु धर्म-कर्म का पालन नियम-पूर्वक करते हैं।

 

 

चतुर्थ भाव में : -


चतुर्थ स्थान में सिंह राशि का शनि व्यक्ति को माता-पिता के सम्बन्ध में असंतोष प्रदान करता है। ऐसे लोग शत्रु स्थान में काफ़ी शक्ति व ऊँचा प्रभाव रखते हैं। भले ही ये लोग सुख प्राप्ति के मामले में कमी महसूस करते हों, परन्तु मुश्किलों से गुजर कर भी अपनी भाग्य-वृद्धि करने में सक्षम होते हैं।



द्वितीय स्थान में शनि वाले जातक धन-सम्पत्ति के बावजूद बन्धन महसूस करते हैं!



पंचम भाव में : -


पंचम स्थान में शनि कन्या राशि में स्थित होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी बुद्धि के बल पर राज-समाज में मान-सम्मान प्राप्त करता है। ये लोग तत्व-ज्ञानी होने के साथ-२ बड़े ही धैर्य व गंभीरता के साथ अपनी बातें दूसरों के सामने रखते हैं। धन की वृद्धि करने की लालसा इनसे बहुत ज्यादा मेहनत भी करवा लेती है।

 

षष्ठ भाव में : -


षष्ठ भाव में शनि अपनी उच्च राशि में होता है। जिसकी वजह से ऐसे लोग पिता के स्थान, मान-प्रतिष्ठा एवं शत्रु स्थान में बड़ा भारी प्रभाव रखते हैं तथा उसकी उन्नति एवं विस्तार के लिए दिन-रात प्रयत्नशील रहते हैं। ऐसे लोग जीवन के लिए अति आवश्यक चीजों का अभाव महसूस करते हैं।

 

सप्तम भाव में : -


सप्तम भाव में वृश्चिक राशि के शनि वाले जातक गृहस्थ-जीवन का सुख उठाते हुये भी कुछ अशान्ति एवं अलकसाहट महसूस करते हैं। ये लोग धर्म का सामान्य रूप से पालन करते हैं। इन्हें पिता स्थान से शक्ति प्राप्त होती है, परन्तु उसमें इनकी कोई विशेष रुचि नहीं होती।



तृतीय स्थान का शनि जातक को परिश्रम करवा कर ही ऊँचाइयों पर पहुँचाता है!



अष्टम भाव में : -


अष्टम भाव में शनि वाले जातक जहाँ एक ओर लम्बी आयु पाते हैं, वहीं दूसरी ओर भाग्य की उन्नति में रुकावटें एवं यश में कमी भी पाते हैं। ये लोग राज-समाज के सम्बन्ध में भी मान-सम्मान में कमी महसूस करते हैं। ऐसे लोग कुछ गुप्त शक्तियाँ रखते हुये कभी-२ धर्म की हानि भी कर बैठते हैं।

 

नवम्‌ भाव में : -


जिन व्यक्तियों का शनि नवम्‌ स्थान में मकर राशि में होता है, वे अपने पिता के सहयोग से उन्नति के पथ पर अपने-आप ही बढ़ते चले जाते हैं। राजकीय सम्मान पाने के मामले में भी ये भाग्यशाली होते हैं तथा अपने सुन्दर कार्यों से इसे निरन्तर बढ़ाते ही चले जाते हैं। परन्तु अपने भाई-बहनों से इनके सम्बन्ध कुछ शुष्कता लिए हुये होते हैं।

 

दशम्‌ भाव में : -


दशम्‌ भाव में शनि अपनी ही राशि ‘कुम्भ’ में स्थित होता है। ऐसे व्यक्ति राज-समाज में तो काफ़ी मान-सम्मान पाते हैं, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में इन्हें काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे लोग जहाँ एक तरफ़ खर्च के सम्बन्ध में काफ़ी लापरवाही दिखाते हुये अनेक दिक्कतों का सामना करते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ अपनी माँ से भी इनके सम्बन्ध ज्यादा अच्छे नहीं होते।



अष्टम स्थान में शनि कुछ गुप्त शक्तियाँ भी देता है!



एकादश भाव में : -


एकादश स्थान में मीन राशि वाले जातक लोगों के बीच काफ़ी इज्जत एवं मान पाने वाले होते हैं। ये मेहनत के साथ-२ लाभ पाने के लिए गहरी व टेढ़ी चालों का भी प्रयोग करते हैं, क्योंकि इनकी इच्छायें व लालसायें काफ़ी ऊँची होती हैं। इन्हें बुद्धिमान्‌ होने के साथ-२ सन्तान का सुख भी प्राप्त होता है।

 

द्वादश भाव में : -


द्वादश स्थान में शनि अपनी नीच राशि में होता है। ऐसे व्यक्ति पिता के सम्बन्ध में काफ़ी हानि का योग पाते हैं। ये लोग बाहरी स्थानों से लाभ प्राप्त करने तथा भाग्य की उन्नति के लिए गलत रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। इन लोगों का शत्रु स्थान में प्रभाव बढ़ाने के लिए भी प्रयास चलता रहता है।



मुझे पता है, अन्य शेष लग्न वाले लोगों के लिए इन्तजार करना कितना मुश्किल साबित हो रहा होगा; आखिर आपके भविष्य का सवाल है भई! परन्तु ये हमेशा याद रखिए, इन्तज़ार का फ़ल हमेशा मीठा ही होता है। .. 🙂



फ़िर मिलते हैं, विदा!


                                                                              आपकी शुभाकांक्षी
                                                                                       गायत्री


--------------------------------------------------------------------------------------------------


अन्य सम्बन्धित लेख :


‘मेष’ लग्न की कुण्डली के विभिन्न भावों में ‘गुरु’ के स्थित होने का फ़ल

                                
                                          ********


08 फ़रवरी, 2017

जानिए क्या है ‘भद्रा’?





आपने अक्सर सुना होगा कि भद्रा में कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। परन्तु आपमें से अधिकतर लोगों को ये पता ही नहीं होगा कि भद्रा आखिर कहते किसे हैं। चलिए आज हम आपको ‘भद्रा’ से ही परिचित कराते हैं।

-----------------------------------------------------------------------------------------------------


मैंने अपने पंचांग से सम्बन्धित एक लेख में आपको ‘करण’ के बारे में बताया था, जिसमें एक जगह हल्का सा जिक्र ‘भद्रा’ का भी आया था। दरअसल ‘विष्टि करण’ को ही भद्रा कहते हैं। आज हम इसके बारे में आपको विस्तार से बताने जा रहे हैं।

 

भद्रा कब होती है?


आप जानते ही हैं कि करण ‘तिथि के आधे भाग’ को कहते हैं। चूँकि विष्टि करण की पुनरावृत्ति माह में ८ बार होती है; इसलिए प्रत्येक माह में ८ बार भद्रा आती है। प्रत्येक मास की ४ थी, ११ वीं, १८ वीं एवं २५ वीं तिथियों के उत्तरार्द्ध में तथा ८ वीं, १५ वीं, २२ वीं एवं २९ वीं तिथियों के पूर्वार्द्ध में भद्रा का वास होता है। अर्थात्‌ हर माह भद्रा ४ बार दिन में और ४ बार रात में आती है।

 

 

भद्रा कहाँ निवास करती है?


भद्रा अलग-२ समय पर अलग-२ लोकों में निवास करती है, जो वस्तुत: चन्द्रमा की राशि पर निर्भर करता है। इसे निम्न सारणी द्वारा स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है: -



भद्रा लोक वास


ऐसा माना जाता है कि जिस लोक में भद्रा का वास होता है, वहीं पर वास्तविक रूप में उसका बुरा असर भी पड़ता है। अर्थात्‌ पृथ्वी लोक के वासी भद्रा के बुरे असर से तभी प्रभावित होते हैं, जब भद्रा के समय चन्द्रमा कर्क, सिंह, कुंभ या मीन राशि में हो।

 

 

भद्रा के अंग 



भद्रा का औसत मान ३० घटी (१२ घण्टे) होता है। इसे भद्रा के विभिन्न अंगों में निम्न सारणी के अनुसार बाँटा जा सकता है : -







                

 

भद्रा का मुख एवं पुच्छ : -



कृष्ण पक्ष की भद्रा ‘वृश्चिक’ तथा शुक्ल पक्ष की भद्रा ‘सर्पिणी’ कही जाती है। चूँकि बिच्छू की पूँछ तथा सर्प के मुँह में विष होता है; इसलिए ऐसा माना जाता है कि कृष्ण पक्ष की भद्रा की पूँछ तथा शुक्ल पक्ष की भद्रा का मुख विशेष रूप से त्याग देना चाहिए। भद्रा के मुख एवं पुच्छ का पता निम्न सारणी से लगाया जा सकता है : -



भद्रा का मुख एवं पुच्छ




भद्रा के दौरान यात्रा-निषेध 



भद्रा के दौरान वैसे तो कई कार्य वर्जित हैं, परन्तु विशेष रूप से यात्रा का निषेध माना जाता है। अगर यात्रा करना अति-आवश्यक ही हो; तो भी उस दिशा में यात्रा नहीं करना चाहिए, जिस दिशा में भद्रा का वास हो। भद्रा की दिशा तिथियों पर निर्भर करती है, जिसे निम्न सारणी द्वारा समझा जा सकता है : -



भद्रा का दिशा वास





भद्रा के दौरान वर्जित कार्य



भद्रा में यात्रा-निषेध के अलावा अन्य कई कार्य भी वर्जित हैं; जैसे : - वैवाहिक या अन्य मांगलिक कार्य, गृहारंभ, गृह-प्रवेश, यज्ञोपवीत आदि।

 

 

क्या भद्रा शुभ भी होती है?



भद्रा हमेशा अशुभ नहीं होती, कुछ कार्यों को करने के लिए ये शुभ मानी जाती है; जैसे : - जातकर्म संस्कार, यज्ञ, भोजन बनाने, व्यापार तथा हरितालिका एवं होलिका पूजन। इसके अतिरिक्त बाँधना, कैद करना, विष देना, अग्नि देना, अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग, काटना आदि नकारात्मक कार्य भी इस दौरान किए जा सकते हैं।



इस लेख को समझने में कोई दिक्कत तो नहीं आई ना? समय-२ पर अपने सुझावों से अवश्य अवगत कराते रहिये।



फ़िर मिलते हैं, विदा!


                                                                             शुभेच्छा के साथ
                                                                                   गायत्री


                                           ********